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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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द्वितीय अध्याय ३३
दुःख-सुख, मान-अपमान को सहन करना एक योगी पर निर्भर करता है। यह
हृदय-देश की लड़ाई का चित्रण है। बाहर युद्ध के लिये गीता नहीं कहती। यह
क्षेत्र-क्षेत्रज्ञ का संघर्ष है, जिसमें आसुरी सम्पद् का सर्वथा शमन कर परमात्मा
में स्थिति दिलाकर दैवी सम्पद् भी शान्त हो जाती है। जब विकार हैं ही नहीं
तो सजातीय प्रवृत्तियाँ किस पर आक्रमण करें? अतः पूर्णत्व के साथ वे भी
शान्त हो जाती हैं, इससे पहले नहीं। गीता अन्तर्देश की लड़ाई का चित्रण है।
इस त्याग से मिलेगा क्या? इससे लाभ क्या है? इस पर श्रीकृष्ण कहते हैं-
यं हि न व्यथयन्त्येते पुरुषं पुरुषर्षभ।
समदुःखसुखं धीरं सोऽमृतत्वाय कल्पते॥१५॥
क्योंकि हे पुरुषश्रेष्ठ! दुःख-सुख को समान समझनेवाले जिस धीर
पुरुष को इन्द्रियों और विषयों के संयोग व्यथित नहीं कर पाते, वह मृत्यु से परे
अमृत-तत्त्व की प्राप्ति के योग्य हो जाता है। यहाँ श्रीकृष्ण ने एक उपलब्धि
‘अमृत’ की चर्चा की। अर्जुन सोचता था कि युद्ध के परिणाम में स्वर्ग मिलेगा
या पृथ्वी; किन्तु श्रीकृष्ण कहते हैं कि न स्वर्ग मिलेगा और न पृथ्वी, बल्कि
अमृत मिलेगा। अमृत क्या है?-
नासतो विद्यते भावो नाभावो विद्यते सतः।
उभयोरपि दृष्टोऽन्तस्त्वनयोस्तत्त्वदर्शिभिः॥१६॥
अर्जुन! असत् वस्तु का अस्तित्व नहीं है, वह है ही नहीं, उसे रोका नहीं
जा सकता और सत्य का तीनों काल में अभाव नहीं है, उसे मिटाया नहीं जा
सकता। अर्जुन ने पूछा- क्या भगवान होने के नाते आप कहते हैं? श्रीकृष्ण ने
बताया- मैं तो कहता ही हूँ, इन दोनों का यह अन्तर हमारे साथ-साथ
तत्त्वदर्शियों द्वारा भी देखा गया है। श्रीकृष्ण ने वही सत्य दोहराया, जो तत्त्वदर्शियों
ने कभी देख लिया था। श्रीकृष्ण भी एक तत्त्वदर्शी महापुरुष थे। परमतत्त्व
परमात्मा का प्रत्यक्ष दर्शन करके उसमें स्थितिवाले तत्त्वदर्शी कहलाते हैं। सत्
और असत् हैं क्या? इस पर कहते हैं-
अविनाशि तु तद्विद्धि येन सर्वमिदं ततम् ।
विनाशमव्ययस्यास्य न कश्चित्कर्तुमर्हति॥१७॥