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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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द्वितीय अध्याय ३१
को सुखानेवाले शोक को दूर कर सके। जब शोक बना ही है तो यह सब लेकर
ही मैं क्या करूँगा? यदि इतना ही मिलना है तो क्षमा करें। अर्जुन ने सोचा,
अब इसके आगे बतायेंगे भी क्या?
सञ्जय उवाच
एवमुक्त्वा हृषीकेशं गुडाकेशः परन्तप।
न योत्स्य इति गोविन्दमुक्त्वा तूष्णीं बभूव ह।।९।।
संजय बोला- हे राजन्! मोहनिशाजयी अर्जुन ने हृदय के सर्वज्ञ श्रीकृष्ण
से यह कहकर कि ‘गोविन्द! मैं युद्ध नहीं करूँगा’ चुप हो गया। अभी तक
अर्जुन की दृष्टि पौराणिक है, जिसमें कर्मकाण्डों के साथ भोगों की उपलब्धि
का विधान है, जिसमें स्वर्ग ही सब कुछ माना जाता है- जिस पर श्रीकृष्ण
प्रकाश डालेंगे कि यह विचारधारा भी गलत है।
तमुवाच हृषीकेशः प्रहसन्निव भारत।
सेनयोरुभयोर्मध्ये विषीदन्तमिदं वचः।।१०।।
उसके उपरान्त हे राजन्! अन्तर्यामी योगेश्वर श्रीकृष्ण ने दोनों सेनाओं
के बीच में उस शोकयुक्त अर्जुन को हँसते हुए-से यह वचन कहा-
श्रीभगवानुवाच
अशोच्यानन्वशोचस्त्वं प्रज्ञावादांश्च भाषसे।
गतासूनगतासूंश्च नानुशोचन्ति पण्डिताः।।११।।
अर्जुन! तू न शोक करने योग्यों के लिये शोक करता है और पण्डितों
के-से वचन कहता है; किन्तु बुद्धिसम्पन्न पण्डितजन जिनके प्राण चले गये हैं
उनके लिये तथा जिनके प्राण नहीं गये हैं उनके लिये भी शोक नहीं करते;
क्योंकि वे भी मर जायेंगे। तू पण्डितों-जैसी बातें भर करता है, वस्तुतः ज्ञाता
है नहीं; क्योंकि-
न त्वेवाहं जातु नासं न त्वं नेमे जनाधिपाः।
न चैव न भविष्यामः सर्वे वयमतः परम् ।।१२।।