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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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३७२ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
में आयी तो वही वैश्य है। प्रकृति के संघर्ष को झेलने की क्षमता और शौर्य
आने पर वही व्यक्ति क्षत्रिय है और ब्रह्म के तद्रूप होने की क्षमता- ज्ञान
(वास्तविक जानकारी), विज्ञान (ईश्वरीय वाणी का मिलना), उस अस्तित्व
पर निर्भर रहने की क्षमता ऐसी योग्यताओं के आने पर वही ब्राह्मण है।
इसलिये योगेश्वर श्रीकृष्ण (गीता, अध्याय १८/४६-४७ में) कहते हैं कि
स्वभाव में पायी जानेवाली क्षमता के अनुसार कर्म में लगना स्वधर्म है। हल्का
होने पर भी स्वभाव से उपलब्ध स्वधर्म श्रेयतर है और क्षमता अर्जित किये
बिना ही दूसरों के उन्नत कर्म का परिपालन भी हानिकारक है। स्वधर्म में मरना
भी श्रेयस्कर है; क्योंकि वस्त्र बदलने से बदलनेवाला तो बदल नहीं जाता।
उसके साधन का क्रम वहीं से पुनः आरम्भ हो जायेगा, जहाँ से छूटा था।
सोपानशः चलकर वह परमसिद्धि अविनाशी पद को पा लेगा।
इसी पर पुनः बल देते हैं कि जिस परमात्मा से सभी प्राणियों की उत्पत्ति
हुई है, जो सर्वत्र व्याप्त है, स्वभाव से उत्पन्न हुई क्षमता के अनुसार उसे
भलीभाँति पूजकर मानव परमसिद्धि को प्राप्त हो जाता है। अर्थात् निश्चित
विधि से एक परमात्मा का चिन्तन ही धर्म है।
धर्म में प्रवेश किसको है? इसे करने का अधिकार किसे है? इसे स्पष्ट
करते हुए योगेश्वर ने बताया कि- “अर्जुन ! अत्यन्त दुराचारी भी यदि अनन्य
भाव से मुझे भजता है (अनन्य अर्थात् अन्य न), मुझे छोड़कर अन्य किसी
को भी न भजकर केवल मुझे भजता है तो ‘क्षिप्रं भवति धर्मात्मा’- वह
शीघ्र ही धर्मात्मा हो जाता है, उसकी आत्मा धर्म से संयुक्त हो जाती है।” अतः
श्रीकृष्ण के अनुसार धर्मात्मा वह है, जो एक परमात्मा में अनन्य निष्ठा से लग
गया है। धर्मात्मा वह है, जो एक परमात्मा की प्राप्ति के लिये नियत कर्म का
आचरण करता है। धर्मात्मा वह है, जो स्वभाव से नियत क्षमता के अनुसार
परमात्मा की शोध में संलग्न है।
अन्त में कहते हैं कि ‘सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज।’-
अर्जुन ! सारे धर्मों की चिन्ता छोड़कर एक मेरी शरण में हो जा। अतः एक
परमात्मा के प्रति समर्पित व्यक्ति ही धार्मिक है। एक परमात्मा में श्रद्धा स्थिर
करना ही धर्म है। उस एक परमात्मा की प्राप्ति की निश्चित क्रिया को करना