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यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

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उपशम ३७१
महापुरुषों के पदचिह्न नहीं बताये गये, करके नहीं सिखाये गये, कल्याण की
व्यवस्था नहीं मिली तो वह स्थान गलत है। वहाँ आपको केवल रूढ़ि मिलेगी।
वहाँ जाने में आपका नुकसान है। व्यक्तिगत रूप से घर-घर, गली-गली
जाकर उपदेश पहुँचाने की अपेक्षा सामूहिक उपदेश केन्द्रों के रूप में इन
धार्मिक संस्थानों की स्थापना की गयी थी; किन्तु कालान्तर में इन प्रेरणास्थलियों
से ही मूर्तिपूजा तथा रूढ़ियों ने धर्म का स्थान ग्रहण कर लिया। यहीं से भ्रम
पनप गया।
ग्रन्थ- इसी प्रकार पुस्तकों का अध्ययन आवश्यक है, जिससे आप
उस निर्दिष्ट क्रिया को समझ सकें, जिसे योगेश्वर श्रीकृष्ण ने नियत कर्म कहा
है और जब समझ में आ जाय तो तुरन्त करने में लग जायँ। विस्मृत होने लगे
तो पुनः अध्ययन कर लें। यह नहीं कि पुस्तक को हाथ जोड़कर अक्षत, चन्दन
छिड़ककर रख दें। पुस्तक मार्ग-निर्देशक चिह्न है, जो पूर्तिपर्यन्त साथ देता है।
देखते हुए आगे बढ़ते चलें अपने गन्तव्य की ओर। जब इष्ट को हृदय से पकड़
लेंगे तो वह इष्ट ही पुस्तक बन जायेगा। अतः स्मृति सँजोना हानिकारक नहीं
है; किन्तु इन स्मृतिचिह्नों की पूजा से ही सन्तुष्ट हो जाना हानिकारक है।
धर्म- (अध्याय २/१६-२९) योगेश्वर श्रीकृष्ण के अनुसार असत्
वस्तु का अस्तित्व नहीं है और सत् का कभी अभाव नहीं है। परमात्मा ही सत्य
है, शाश्वत है; अजर, अमर, अपरिवर्तनशील और सनातन है; किन्तु वह
परमात्मा अचिन्त्य और अगोचर है, चित्त की तरंगों से परे है। अब चित्त का
निरोध कैसे हो? चित्त का निरोध करके उस परमात्मा को पाने की विधि-
विशेष का नाम कर्म है। इस कर्म को कार्यरूप देना ही धर्म है, दायित्व है।
गीता (अध्याय २/४०) में है कि- अर्जुन! इस कर्मयोग में आरम्भ का
नाश नहीं है। इस कर्मरूपी धर्म का किंचिन्मात्र साधन जन्म-मृत्यु के महान्
भय से उद्धार करनेवाला होता है अर्थात् इस कर्म को कार्यरूप देना ही धर्म है।
इस नियत कर्म (साधन-पथ) को साधक के स्वभाव में उपलब्ध
क्षमता के अनुसार चार भागों में बाँटा गया है। कर्म को समझकर मनुष्य जबसे
आरम्भ करता है, उस आरम्भिक अवस्था में वह शूद्र है। क्रमशः विधि पकड़