यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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धर्म है। इस स्थिति को प्राप्त महापुरुष, आत्मतृप्त महापुरुषों का सिद्धान्त ही
सृष्टि में एकमात्र धर्म है। उनकी शरण में जाना चाहिये कि उन महापुरुषों ने
कैसे उस परमात्मा को पाया? किस मार्ग से चले? वह मार्ग सदा एक ही है,
उस मार्ग से चलना धर्म है।
धर्म मनुष्य के आचरण की वस्तु है। वह आचरण केवल एक है-
'व्यवसायात्मिका बुद्धिरेकेह कुरुनन्दन।' (२/४१) इस कर्मयोग में
निश्चयात्मक क्रिया एक ही है- इन्द्रियों की चेष्टा और मन के व्यापार को
संयमित कर आत्मा में (परात्पर ब्रह्म में) प्रवाहित करना (४/२७)।
धर्मान्तरण- सनातन-धर्म के आदिदेश भारत में कुरीतियाँ यहाँ तक
पनपीं कि मुसलमानों के आक्रमण के समय उनका धर्म आक्रामकों के हाथ
का एक ग्रास चावल खाने से, दो घूँट पानी पीने से नष्ट होने लगा। धर्मभ्रष्ट
घोषित हजारों हिंदुओं ने आत्महत्या कर ली। धर्म के लिये वे मरना जानते थे,
लेकिन धर्म समझें तब तो। धर्म तो हो गया छुईमुई। छुईमुई का पौधा छूने पर
मुरझा जाता है, छूटते ही पनप जाता है; किन्तु उनका सनातन-धर्म तो ऐसा
मुरझाया कि कभी नहीं पनपा। जिस सनातन आत्मा को भौतिक वस्तुएँ स्पर्श
भी नहीं कर पातीं, वह कहीं छूने-खाने से नष्ट होता है? आप तलवार से मरें,
धर्म छूने से मर गया? क्या सचमुच धर्म नष्ट हुआ? कदापि नहीं। धर्म के नाम
पर कोई कुरीति पल रही थी, वह नष्ट हुई। अलाउद्दीन खिलजी के शासनकाल
में बयाना के काजी मुगीसुद्दीन ने व्यवस्था दी कि यदि कोई मुसलमान थूकना
चाहता है तो हिन्दुओं को अपना मुँह खोल देना चाहिये। वह हिन्दू दीनदार हो
जायेगा; क्योंकि उसके पास कोई धर्म नहीं है। बुरा क्या कहा उसने? मुँह में
थूकने से तो एक ही मुसलमान बनता, कुएँ में थूकने से तो हजारों बन जाते थे।
वस्तुतः वह आततायी था या उस समय का हिन्दू समाज?
जिन्होंने इस प्रकार धर्म-परिवर्तन कर लिया, क्या कोई धर्म पा गये?
हिन्दू से मुसलमान बन जाना या एक प्रकार के रहन-सहन से दूसरे रहन-
सहन में चले जाना धर्म तो नहीं है। इस प्रकार योजनाबद्ध षड्यंत्र का शिकंजा
बनाकर जिन्होंने उन्हें बदला, क्या वे धर्मात्मा थे? वे तो और भी बड़ी कुरीतियों
के शिकार थे। हिन्दू उसी में जाकर फँस गये। अविकसित और गुमराह कबीलों