यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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नहीं। वस्तुतः तब भी वह परिस्थिति विद्यमान थी और आज भी ज्यों-की-त्यों
है। जब चित्त को सब ओर से समेटकर आप हृदय-देश में ध्यान करने लगेंगे
तो काम, क्रोध, राग, द्वेषादि विकार आपके चित्त को टिकने नहीं देंगे। उन
विकारों से संघर्ष करना, उनका अन्त करना ही युद्ध है। विश्व में युद्ध होते ही
रहते हैं; किन्तु उनसे कल्याण नहीं अपितु विनाश होता है। उसे शान्ति कह लें
अथवा परिस्थिति, अन्य कोई शान्ति इस दुनिया में नहीं मिलती। शान्ति तभी
मिलती है, जब यह आत्मा अपने शाश्वत को पा ले। यही एकमात्र शान्ति है,
जिसके पीछे अशान्ति नहीं है। किन्तु यह शान्ति साधनगम्य है, उसी के लिये
नियत कर्म का विधान है।
वर्ण- उस कर्म को ही चार वर्णों में बाँटा गया। चिन्तन में लगते तो
सभी हैं; किन्तु कोई श्वास-प्रश्वास की गति रोकने में सक्षम होगा, तो कोई
आरम्भ में दो घण्टे चिन्तन में बैठकर दस मिनट भी अपने पक्ष में नहीं पाता।
ऐसी स्थितिवाला अल्पज्ञ साधक शूद्र श्रेणी का है। वह अपनी स्वाभाविक
क्षमता के अनुसार परिचर्या से ही कर्म आरम्भ करे। क्रमशः वैश्य, क्षत्रिय और
विप्र श्रेणी की क्षमता उसके स्वभाव में ढलती जायेगी। वह उन्नत होता जायेगा।
किन्तु वह ब्राह्मण श्रेणी दोषयुक्त है; क्योंकि अभी वह ब्रह्म अलग है। ब्रह्म में
प्रवेश पा जाने पर वह ब्राह्मण भी नहीं रह जाता। वर्ण का अर्थ है आकृति। यह
शरीर आपकी आकृति नहीं है। आपकी आकृति वैसी है, जैसी आपकी वृत्ति
है। श्रीकृष्ण कहते हैं- अर्जुन! पुरुष श्रद्धामय है, इसलिये कहीं-न-कहीं
उसकी श्रद्धा अवश्य होगी। जैसी श्रद्धावाला वह पुरुष है, स्वयं भी वही है।
जैसी वृत्ति, वैसा पुरुष। वर्ण कर्म की क्षमता का आन्तरिक मापदण्ड है; किन्तु
लोगों ने नियत कर्म को छोड़कर बाहर समाज में जन्म के आधार पर जातियों
को वर्ण मानकर उनकी जीविका निश्चित कर दी, जो एक सामाजिक व्यवस्था
मात्र थी। वे कर्म के यथार्थ रूप को तोड़ते-मरोड़ते हैं, जिससे उनकी खोखली
सामाजिक मर्यादा और जीविका को ठेस न लगे। कालान्तर में वर्ण का
निर्धारण केवल जन्म से होने लगा। ऐसा कुछ नहीं है। श्रीकृष्ण ने कहा, चार
वर्णों की सृष्टि मैंने की। क्या भारत से बाहर सृष्टि नहीं है? अन्यत्र तो इन
जातियों का अस्तित्व ही नहीं है। भारत में इनके अन्तर्गत लाखों जातियाँ