Skip to content
SarvaKosh
यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)

Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)

by स्वामी अड़गड़ानन्द

Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)

DevanagariHindipublished429 pages

Page 401 of 429

Read in context
Page 401

३६६ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता

योगेश्वर श्रीकृष्ण के इतना बल देने पर भी आप उस नियत कर्म को न
करके, श्रीकृष्ण का कहना न मानकर उल्टी-सीधी कल्पना करते हैं कि जो
कुछ भी संसार में किया जाता है, कर्म है। कुछ भी त्यागने की जरूरत नहीं है
केवल फल की कामना न करो, हो गया निष्काम कर्मयोग। कर्त्तव्य भावना से
करो- हो गया कर्तव्य योग। कुछ भी करो, नारायण को समर्पण कर दो- हो
गया समर्पण योग। इसी प्रकार यज्ञ का नाम आते ही हम भूतयज्ञ, पितृयज्ञ,
पंचयज्ञ, विष्णु के निमित्त किया जानेवाला यज्ञ गढ़ लेते हैं और उसकी क्रिया
में स्वाहा बोलकर खड़े हो जाते हैं। यदि श्रीकृष्ण ने स्पष्ट न कहा हो तो हम
कुछ भी करें। यदि बताया है तो जितना कहा है उतना ही मान लें। किन्तु हम
मान नहीं पाते। विरासत में अनेक रीति-रिवाज, पूजा-पद्धतियाँ हमारे मस्तिष्क
को जकड़े हुई हैं। बाह्य वस्तुओं को कदाचित् हम बेचकर भाग भी सकते हैं,
किन्तु ये पूर्वाग्रह मस्तिष्क में बैठकर हमारे साथ चलते हैं। श्रीकृष्ण के शब्दों
को भी हम इन्हीं के अनुरूप ढालकर ग्रहण करते हैं। गीता तो अत्यन्त
बोधगम्य सरल संस्कृत में है। आप अन्वयार्थ भी लें तो कभी सन्देह नहीं
होगा। यही प्रयास प्रस्तुत पुस्तक में किया गया है।
युद्ध- यदि यज्ञ और कर्म, दो प्रश्न ही यथार्थ समझ लें तो युद्ध, वर्ण-
व्यवस्था, वर्णसंकर, ज्ञानयोग, कर्मयोग अथवा संक्षेप में सम्पूर्ण गीता ही
आपकी समझ में आ जाय। अर्जुन लड़ना नहीं चाहता था। वह धनुष फेंककर
रथ के पिछले भाग में बैठ गया; किन्तु योगेश्वर श्रीकृष्ण ने एकमात्र कर्म की
शिक्षा देकर कर्म को केवल दृढ़ाया ही नहीं बल्कि अर्जुन को उस कर्म पर
चला भी दिया। युद्ध हुआ, इसमें सन्देह नहीं। गीता के पन्द्रह-बीस श्लोक ऐसे
हैं जिनमें बार-बार कहा गया, अर्जुन ! तू युद्ध कर; किन्तु एक भी श्लोक ऐसा
नहीं है, जो बाहरी मारकाट का समर्थन करता हो। (द्रष्टव्य है- अध्याय २, ३,
११, १५ और १८) क्योंकि जिस कर्म पर बल दिया गया वह है नियत कर्म,
जो एकान्त-देश के सेवन से, चित्त को सब ओर से समेटकर ध्यान करने से
होता है। जब कर्म का यही स्वरूप है, चित्त एकान्त और ध्यान में लगा है तो
युद्ध कैसा? यदि गीतोक्त कल्याण युद्ध करनेवाले के लिये ही है तो आप गीता
का पिण्ड छोड़ दें। आपके समक्ष अर्जुन-जैसी युद्ध की कोई परिस्थिति तो है