यथार्थ गीता (श्रीमद्भगवद्गीता - स्वामी अड़गड़ानन्द)
Yatharth Geeta - Srimad Bhagavad Gita (Swami Adgadanand)
by स्वामी अड़गड़ानन्द
Source: मानव धर्मशास्त्र - ५२०० वर्षों के अन्तराल के बाद श्रीमद्भगवद्गीता की शाश्वत व्याख्या · श्री परमहंस स्वामी अड़गड़ानन्दजी आश्रम ट्रस्ट · 2015 (origin)
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Read in context३६८ श्रीमद्भगवद्गीता : यथार्थ गीता
और उप-जातियाँ हैं। श्रीकृष्ण ने क्या मनुष्यों को बाँटा? नहीं, ‘गुणकर्म
विभागशः’- गुण के आधार पर कर्म बाँटे गये। ‘कर्माणि प्रविभक्तानि’-
कर्म बाँटा गया। कर्म समझ में आ गया तो वर्ण समझ में आ जायेगा और वर्ण
समझ में आ गया तो वर्णसंकर का यथार्थ रूप आप समझ लेंगे।
वर्णसंकर- इस कर्मपथ से च्युत होना ही वर्णसंकर है। आत्मा का
शुद्ध वर्ण है परमात्मा। उसमें प्रवेश दिलानेवाले कर्म से हटकर प्रकृति में
मिश्रित हो जाना ही वर्णसंकर है। श्रीकृष्ण ने स्पष्ट किया कि इस कर्म को किये
बिना उस स्वरूप को कोई पाता नहीं और प्राप्तिवाले महापुरुष को कर्म करने
से न कोई लाभ है और न छोड़ने से कोई हानि, फिर भी लोक-संग्रह के लिये
वे कर्म में बरतते हैं। उन महापुरुषों की तरह मुझे भी प्राप्त होने योग्य कोई
वस्तु अप्राप्त नहीं है, फिर भी मैं पीछेवालों के हित की इच्छा से कर्म में ही
बरतता हूँ। यदि न करूँ तो सभी वर्णसंकर हो जायँ। स्त्रियों के दूषित होने से
वर्णसंकर होना तो सुना गया; किन्तु यहाँ श्रीकृष्ण कहते हैं कि स्वरूपस्थ
महापुरुष कर्म न करे तब लोग वर्णसंकर हो जाते हैं। उस महापुरुष की नकल
करके आराधना बन्द कर देने से वे प्रकृति में भटकते रहेंगे, वर्णसंकर हो
जायेंगे; क्योंकि इस कर्म को करके ही उस परम नैष्कर्म्य की स्थिति को, अपने
शुद्ध वर्ण परमात्मा को पाया जा सकता है।
ज्ञानयोग तथा कर्मयोग- कर्म एक ही है- नियत कर्म, आराधना;
किन्तु उसे करने के दृष्टिकोण दो हैं। अपनी शक्ति को समझकर, हानि-लाभ
का निर्णय लेकर इस कर्म को करना ‘ज्ञानयोग’ है। इस मार्ग का साधक जानता
है कि “आज मेरी यह स्थिति है, आगे इस भूमिका में परिणत हो जाऊँगा। फिर
अपने स्वरूप को प्राप्त करूँगा।” इस भावना को लेकर कर्म में प्रवृत्त होता है।
अपनी स्थिति का ज्ञान रखकर चलता है, इसलिये ज्ञानमार्गी कहा जाता है।
समर्पण के साथ उसी कर्म में प्रवृत्त होना, हानि-लाभ का निर्णय इष्ट पर
फेंककर चलना निष्काम कर्मयोग, भक्तिमार्ग है। दोनों के प्रेरक सद्गुरु हैं।
एक ही महापुरुष से शिक्षा लेकर एक स्वावलम्बी होकर उस कर्म में प्रवृत्त
होता है और दूसरा उनसे शिक्षा लेकर, उन्हीं पर निर्भर होकर प्रवृत्त होता है।
बस अन्तर इतना ही है। इसीलिये योगेश्वर श्रीकृष्ण ने कहा- अर्जुन! सांख्य