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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

DevanagariSanskritpublished421 pages

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उत्तरार्ध इक्कीसवां अध्याय
रथंतर छंद से स्तुति की गई है. हम तेज और हवि को इंद्र देव हेतु स्थापित करते हैं.
इंद्र देव हमारे लिए बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २३ )
ग्रीष्मेण ऋतुना देवा रुद्राः पञ्चदशे स्तुताः.
बृहता यशसा बल १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२४)
रुद्र देव गणों की पंद्रह प्रार्थनाओं एवं ग्रीष्मऋतु से स्तुति की गई है. विशाल
यश व बल से हवि को इंद्र देव हेतु स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल एवं
आयु धारने की कृपा करें. ( २४ )
वर्षाभिर्ऋतुनादित्याः स्तोमे सप्तदशे स्तुताः.
वैरूपेण विशौजसा हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२५)
आदित्य देवगणों की सत्रह स्तोत्रों एवं वर्षा ऋतु से उपासना की गई है. वैरूप
छंद और ओज से हम इंद्र देव हेतु हवि स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल
एवं आयु धारने की कृपा करें. ( २५ )
शारदेन ऋतुना देवा ऽ एकवि १७ श ऋभव स्तुताः.
वैराजेन श्रिया श्रिय १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२६)
ऋभु देवगणों की इक्कीस स्तोत्रों तथा शरद ऋतु से उपासना की गई है. वैराज
छंद श्रिया ( लक्ष्मी ) की श्री बढ़ाते हैं. हम उस से इंद्र देव हेतु हवि स्थापित करते
हैं. इंद्र देव हमारे लिए बल तथा आयु धारने की कृपा करें. ( २६ )
हेमन्तेन ऋतुना देवास्त्रिणवे मरुत स्तुताः.
बलेन शक्वरीः सहो हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२७)
मरुद् गण की नौ से तिगुने स्तोत्रों और हेमंत ऋतु से उपासना की गई है.
शक्वरी छंद और बल से हम इंद्र देव के लिए हवि स्थापित करते हैं. इंद्र देव हमारे
लिए बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २७ )
शैशिरण ऋतुना देवास्त्रयस्त्रि १७ शेमृताः स्तुताः.
सत्येन रेवतीः क्षत्र १७ हविरिन्द्रे वयो दधुः.. (२८)
हम तीस और तीन देवगणों की रेवती छंद से और शिशिर ऋतु से उपासना
करते हैं. हम सत्य और बल से इंद्र देव की स्थापना करते हैं. इंद्र देव हमारे लिए
बल और आयु धारने की कृपा करें. ( २८ )
होता यक्षत्समिधाग्निमिडस्पदेश्विनेन्द्र १७ सरस्वतीमजो धूम्रो न गोधूमैः कुवलैर्भेषजं
मधुशष्पैर्न तेज ऽ इन्द्रियं पयः सोमः परिस्रुता घृतं मधु व्यन्त्वाज्यस्य होतर्यज.. (२९)
होता ने अग्नि में समिधाएं प्रज्वलित की हैं. यह यज्ञ अश्विनी देव, इंद्र देव और
२७४ - यजुर्वेद