यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
ऋचा नामक अग्नि है. यजु नामक अग्नि है. साम नामक अग्नि है. इस पृथ्वि
पर जो पंच अग्नियां हैं, उन में आप श्रेष्ठ हैं. आप हम सब को दीर्घ काल तक
जिलाने की कृपा कीजिए. (६७)
वार्त्रहत्याय शवसे पृतनाषाह्वाय च. इन्द्र त्वा वर्तयामसि.. (६८)
हे इंद्र देव! आप शत्रुओं पर आक्रमण कर के उन का नाश कर देते हैं. आप
सामर्थ्यवान हैं. हम बारबार आप का आह्वान करते हैं. (६८)
सहदानुं पुरुहूत क्षियन्तमहस्तमिन्द्र सं पिणक् कुणारुम्.
अभि वृत्रं वर्धमानं पियारूमपादमिन्द्र तवसा जघन्थ.. (६९)
हे इंद्र देव! आप को हजारों यजमान हवि भेंट करते हैं. आप यजमान द्वारा भेंट
की गई हवि को ग्रहण करते हैं. आप हमारे नजदीक के शत्रुओं को कुचल दीजिए.
आप गालीगलौज करने वाले शत्रुओं को साधनहीन कर दीजिए. आप ऐसे शत्रुओं
का नाश कर दीजिए. आप सब ओर आतंक फैला सकते हैं. आप सब ओर से
बढ़ोतरी पाने वाले हैं. आप से अनुरोध है कि आप वृत्रासुर को पैर रहित बना
दीजिए. आप वृत्रासुर का नाश कर दीजिए. (६९)
वि न ऽ इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः.
यो अस्माँ २ अभिदासत्यधरं गमया तमः.. (७०)
हे इंद्र देव! आप से अनुरोध है कि आप युद्धों में हमारे दुश्मनों को नष्ट कर
दीजिए. जो शत्रु हमारे साथ युद्ध करने के लिए तैयार खड़े हों, उन्हें आप पतन के
गर्त में पहुंचा दीजिए. जो शत्रु हमें दास बनाने की इच्छा रखते हैं, आप उन्हें अंधेरे
गर्त में पहुंचा दीजिए. (७०)
मृगो न भीमः कुचरो गिरिष्ठाः परावत ऽ आ जगन्था परस्याः.
सृक ण्ष स ण्ष शाय पविमिन्द्र तिग्मं वि शत्रून् ताढि वि मृधो नुदस्व.. (७१)
हे इंद्र देव! आप हमारे (कुचाल वाले) चालाक, पर्वत व गुफाओं में छिपे,
शेर जैसे खतरनाक व हमारे पास दूर के शत्रुओं को सब ओर से घेर लीजिए. आप
हमारे तीखे हथियारों से शत्रुओं को भेदिए व पीछे खदेड़ दीजिए. (७१)
वैश्वानरो न ऽ ऊतय ऽ आ प्र यातु परावतः. अग्निनः सुष्टुतीरुप.. (७२)
हे अग्नि! आप विश्व का कल्याण करने वाले हैं. आप आइए. आप हमारी रक्षा
कीजिए. आप हमारी स्तुतियां सुनिए. आप हमारी रक्षा कीजिए. (७२)
पृष्टो दिवि पृष्टो अग्निः पृथिव्यां पृष्टो विश्वा ओषधीरा विवेश.
वैश्वानरः सहसा पृष्टो अग्निः स नो दिवा स रिषस्पातु नक्तम्.. (७३)
यजुर्वेद - २३७