यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 236 of 421
Read in contextपूर्वार्ध अठारहवां अध्याय
हे परम व्योम में स्थित दिव्य शक्तियो! आप यजमान के सधे हुए रूप को जानने
की कृपा कीजिए. जब यजमान देवयान (देवताओं के जाने योग्य) पथ से गमन करें,
उस समय आप इस यजमान की अभीष्टपूर्ति करने की कृपा कीजिए. (६०)
उद्बुध्यस्वाग्ने प्रति जागृहि त्वमिष्टापूर्ते स ँ सृजेथामयं च.
अस्मिन्त्सधस्थे अध्युत्तरस्मिन्विश्वे देवा यजमानश्च सीदत.. (६१)
हे अग्नि! आप जाग्रत होने व यजमान के अभीष्ट की पूर्ति करने की कृपा
कीजिए. आप यजमान के लिए सब सुख सिरजिए. हे विश्वो! यजमान को आप
चिरकाल तक स्वर्गलोक में अधिष्ठित करने की कृपा कीजिए. (६१)
येन वहसि सहस्रं येनाग्ने सर्ववेदसम्. तेनेमं यज्ञं नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे.. (६२)
हे अग्नि! आप जिस से हजारों को वहन करते हैं, आप जिस से सब को
जानते हैं, आप उसी सामर्थ्य से यज्ञ को ले जाने (पहुंचाने) की कृपा कीजिए.
आप देवताओं के गंतव्य पर यजमानों को ले जाने की कृपा कीजिए. (६२)
प्रस्तरेण परिधिना स्रुचा वेद्या च बर्हिषा. ऋचेमं यज्ञं नो नय स्वर्देवेषु गन्तवे.. (६३)
हे अग्नि! पत्थर, परिधि, स्रुक (चम्मच), वेदी, कुशा व ऋचा से आप हमारे
इस यज्ञ को देवताओं के गंतव्य की ओर ले जाने की कृपा कीजिए. (६३)
यद्दत्तं यत्परादानं यत्पूर्तं याश्च दक्षिणाः. तदग्निवैश्वकर्मणः स्वर्देवेषु नो दधत्.. (६४)
हम ने जो कुछ दूसरों को दान किया है, हम ने जो कुछ प्रतिपूर्ति की है, हम ने जो
कुछ दक्षिणा दी है, उसे विश्वकर्मा अग्नि देवताओं के लिए धारने की कृपा करें. (६४)
यत्र धारा ऽ अनपेता मधोर्घृतस्य च याः.
तदग्निवैश्वकर्मणः स्वर्देवेषु नो दधत्.. (६५)
जहां मधु व घी की धाराएं लगातार प्रवाहित होती रहती हैं, उन धाराओं को
विश्वकर्मा अग्नि देवताओं के लिए धारने की कृपा करें. (६५)
अग्निरस्मि जन्मना जातवेदा घृतं मे चक्षुरमृतं म ऽ आसन्.
अर्कस्त्रिधातू रजसो विमानोजस्रो घर्मो हविरस्मि नाम.. (६६)
अग्नि जन्म से ही सर्वज्ञ हैं. घी उन की आंखें हैं. हवि अमृत है. तीनों धातुओं
का सार रज है. वह अजस्र जल का निर्माता है. ग्रीष्म का निर्माता और हवि वही
है. (६६)
ऋचो नामास्मि यजूं षि नामास्मि सामानि नामास्मि.
ये अग्नयः पाञ्चजन्या ऽ अस्यां पृथिव्यामधि.
तेषामसि त्वमुत्तमः प्र नो जीवतवे सुव.. (६७)
२३६ - यजुर्वेद