Skip to content
SarvaKosh
यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

Report a copyright issue

DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 182 of 421

Read in context
Page 182

पूर्वार्ध पंद्रहवां अध्याय
करते हैं. हम शंभू छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम परिभू छंद से आप की
स्थापना करते हैं. हम आच्छ छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम मन से आप की
स्थापना करते हैं. हम व्यच से आप की स्थापना करते हैं. हम सिंधु से आप की
स्थापना करते हैं. हम समुद्र से आप की स्थापना करते हैं. हम सरिर से आप की
स्थापना करते हैं. हम ककुप् से आप की स्थापना करते हैं. हम त्रिक् ककुप् से आप
की स्थापना करते हैं. हम काव्य से आप की स्थापना करते हैं. हम अंकुप् से आप
की स्थापना करते हैं. हम अक्षर से आप की स्थापना करते हैं. हम पंक्ति से आप
की स्थापना करते हैं. हम पदपंक्ति से आप की स्थापना करते हैं. हम विष्टारपंक्ति
से आप की स्थापना करते हैं. हम क्षुरोभ्रज से आप की स्थापना करते हैं. (४)
आच्छच्छन्दः प्रच्छच्छन्दः संयच्छन्दो वियच्छन्दो बृहच्छन्दो रथन्तरच्छन्दो
निकायश्छन्दो विवधश्छन्दो गिरश्छन्दा भ्रजश्छन्दः स १४ स्तुप्छन्दोनुष्टुप्छन्द ऽ
एवश्छन्दो वरिवश्छन्दो वयश्छन्दो वयस्कृतच्छन्दो विष्पर्द्धाश्छन्दो विशालं
छन्दश्छदिश्चन्दो दूरोहणं छन्दस्तन्द्रं छन्दो अङ्काङ्कं छन्दः.. (५)
हम आच्छ छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम प्रच्छ छंद से आप की स्थापना
करते हैं. हम संयच्छ छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वियच्छंद से आप की
स्थापना करते हैं. हम बृहच्छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम रथंतर छंद से आप
की स्थापना करते हैं. हम निकाय छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम विवध छंद
से आप की स्थापना करते हैं. हम गिर छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम भ्रज
छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम स्तुप् छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम
अनुष्टुप् छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम एव छंद से आप की स्थापना करते
हैं. हम वरिव छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वय छंद से आप की स्थापना
करते हैं. हम वयस्कृत छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम विष्पर्द्ध छंद से आप
की स्थापना करते हैं. हम विशाल छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम छदि छंद
से आप की स्थापना करते हैं. हम दूरोहण छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम
तंद्र छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम अंकांक छंद से आप की स्थापना करते
हैं. (५)
रश्मिना सत्याय सत्यं जिन्व प्रेतिना धर्मणा धर्मं जिन्वान्वित्या दिवा दिवं जिन्व
सन्धिनान्तरिक्षेणान्तरिक्षं जिन्व प्रतिधिना पृथिव्या पृथिवीं जिन्व विष्टम्भेन वृष्ट्या वृष्टिं
जिन्व प्रवयाह्नाहर्जिव्वानुया रात्र्या रात्रीं जिन्वोशिजा वसुभ्यो वसूञ्जिन्व
प्रकेतेनादित्येभ्य ऽ आदित्याञ्जिन्व.. (६)
सत्य के लिए रश्मियों का प्रचारप्रसार हो. सत्य की जीत हो. आचरण और धर्म
से धर्म की प्रतिष्ठा हो. दिव्यता से दिव्यलोक को पाएं. संधि से अंतरिक्ष के लिए
अंतरिक्ष को जीतें. प्रतिधान के माध्यम से पृथ्वी के लिए पृथ्वी को जीतें. वृष्टि के
१८२ - यजुर्वेद