यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
Page 181 of 421
Read in contextपंद्रहवां अध्याय
अग्ने जातान् प्र णुदा नः सपत्नान् प्रत्यजातान् नुद जातवेदः.
अधि नो ब्रूहि सुमना ऽ अहेडँस्तव स्याम शर्मं स्त्रिवरूथ ऽ उद्बौ.. (१)
हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप हमारे जो भी विद्रोही उत्पन्न हो चुके हैं, उन का
नाश कीजिए. आप अच्छे मन से हम से बोलिए. आप अच्छे मन से हमें सुख प्रदान
कीजिए. आप की कृपा से हम सुखी हों. आप यज्ञवेदी में बने रहिए. हम आप ही
की कृपा से यज्ञ कर सकें. (१)
सहसा जातान् प्रणुदा नः सपत्नान् प्रत्यजाताञ्जातवेदो नुदस्व.
अधि नो ब्रूहि सुमनस्यमानो वय ँष स्याम प्र णुदा नः सपत्नान्.. (२)
हे अग्नि! आप सर्वज्ञ हैं. आप हमारे जो भी शत्रु उत्पन्न हो चुके हैं, उन का
नाश कीजिए. आप अच्छे मन से हम से बोलिए. हम आप की कृपा से अच्छे मन
वाले हो जाएं. हम शत्रुओं को नष्ट कर के सामर्थ्यशील बन जाएं. (२)
षोडशी स्तोम ऽ ओजो द्रविणं चतुश्चत्वारि ँश श स्तोमो वर्चो द्रविणम्.
अग्नेः पुरीषमस्यप्सो नाम तां त्वा विश्वे अभि गृणन्तु देवाः.
स्तोमपृष्ठा घृतवतीह सीद प्रजावदस्मे द्रविणा यजस्व.. (३)
हम सोलह कलाओं वाले स्तोम से आप की स्थापना करते हैं. सोलह कलाओं
वाले स्तोम ओज पूर्ण व धनपूर्ण हैं. हम चवालीस शक्तियों वाले स्तोम से आप की
स्थापना करते हैं. अग्नि पूर्णतादायी हैं. उन की इस पूर्णता की सभी देवता प्रशंसा
करते हैं. हम आप को धीमी आहुति भेंट करते हैं. आप विराजिए और अपनी प्रजा
को धन प्रदान करने की कृपा कीजिए. (३)
एवश्छन्दो वरिवश्छन्दः शम्भूश्छन्दः परिभूश्छन्द ऽ आच्छच्छन्दो मनश्छन्दो
व्यचश्छन्दः सिन्धुश्छन्दः समुद्रश्छन्दः सरिरं छन्दः ककुप्छन्दस्त्रिककुप्छन्दः काव्यं
छन्दो अङ्कुपं छन्दोक्षरपङ्क्तिश्छन्दः पदपङ्क्तिश्छन्दो विष्टारपङ्क्तिश्छन्दः
क्षुरोभ्राजश्छन्द.. (४)
हम एव छंद से आप की स्थापना करते हैं. हम वरिव छंद से आप की स्थापना
यजुर्वेद - १८१