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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 167 of 421

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Page 167

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
वरूत्रीं त्वष्टुर्वरुणस्य नाभिमविं जज्ञाना १७ रजसः परस्मात्.
मही १७ साहस्त्रीमसुरस्य मायामग्ने मा हि १७ सीः परमे व्योमन्.. (४४)
हे अग्नि! आप विभिन्न रूपों का निर्माण करने वाले हैं. आप वरुण देव की
नाभि हैं. आप उच्चलोक में उत्पन्न, महिमावान और परम व्योमवासी हैं. आप हजारों
के कल्याणकारी हैं. आप किसी भी प्रकार की हिंसा न कीजिए. (४४)
यो अग्निरग्नेरध्यजायत शोकात्पृथिव्या ऽ उत वा दिवस्परि.
येन प्रजा विश्वकर्मा जजान तमग्ने हेडः परि ते वृणक्तु.. (४५)
हे अग्नि! आप पृथ्वी के शोक से उत्पन्न हुए. आप स्वर्गलोक और पृथ्वीलोक
को प्रकाशित करते हैं. स्रष्टा ने आप से ही सृष्टि की रचना की. आप कभी हम पर
क्रोध मत करिए. (४५)
चित्रं देवानामुदगादनीकं चक्षुर्मित्रस्य वरुणस्याग्नेः.
आप्रा द्यावापृथिवी अन्तरिक्ष १७ सूर्य ऽ आत्मा जगतस्तस्थुषश्च.. (४६)
हे अग्नि! मित्र देव और वरुण देव आप के नेत्ररूप हैं. आप अद्भुत शक्तिमान
हैं. आप स्वर्गलोक, पृथ्वीलोक और अंतरिक्षलोक को पूरी तरह प्रकाशित कीजिए.
सूर्य जड़ और चेतन की आत्मा हैं. वे इसी रूप में उदित हुए हैं. (४६)
इमं मा हि १७ सीर्द्विपादं पशु १७ सहस्राक्षो मेधाय चीयमानः.
मयुं पशुं मेधमग्ने जुषस्व तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
मयुं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (४७)
हे अग्नि! आप दोपायों और पशुओं के प्रति हिंसा न करें. आप हजारों नेत्रों
वाले हैं. आप को यज्ञ के लिए प्रकट किया है. आप अन्न व पशुओं की बढ़ोत्तरी
कीजिए. आप हमें वैभव दीजिए. हम सुखी जीवन यापन करें. आप का क्रोध, जो
हम से द्वेष करते हैं, उन्हें पीड़ित करें. (४७)
इमं मा हि १७ सीरेकशफं पशुं कनिक्रदं वाजिनं वाजिनेषु.
गौरमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
गौरं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (४८)
हे अग्नि! आप के घोड़े अत्यंत गतिशील हैं. वे हिनहिना कर अपनी स्फूर्ति दिखाते
हैं. आप इन घोड़ों के प्रति हिंसक मत होइए. आप जंगली जानवरों को परेशान कीजिए.
आप अपने ज्वालामय शरीर को बढ़ाइए. जो हम से प्रेम नहीं रखते, जो हम से द्वेष
रखते हैं, आप का क्रोध उन्हें पीड़ित करे. (४८)
इम १७ सहस्र १७ शतधारमुत्सं व्यच्यमान १७ सरिरस्य मध्ये.
घृतं दुहानामितिं जनायाग्ने मा हि १७ सीः परमे व्योमन्.
यजुर्वेद - १६७