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यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)

Yajurveda Samhita with Hindi Translation

by डा. रेखा व्यास

Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)

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DevanagariSanskritpublished421 pages

Page 166 of 421

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Page 166

पूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
रथ में घोड़े जोतिए. आप चिरकाल से हमारे होता हैं. आप यज्ञ स्थान में
विराजिए. ( ३७ )
सम्यक् स्रवन्ति सरितो न धेना ऽ अन्तर्ह्रदा मनसा पूयमाना:.
घृतस्य धारा ऽ अभि चाकशीमि हिरण्ययो वेतसो मध्ये अग्ने:... ( ३८)
सम्यक् रूप से प्रवाहित होने वाली सरिता के समान हमारे हृदय और मन से
पवित्र वाणियां प्रवाहित होती हैं. यज्ञ की अग्नि स्वर्णिम प्रकाश वाली है. घी की
धाराएं अग्नि के बीच बहा कर उसे स्वर्णिम बना देती हैं. ( ३८ )
ऋचे त्वा रुचे त्वा भासे त्वा ज्योतिषे त्वा.
अभूदिदं विश्वस्य भुवनस्य वाजिनमग्नेर्वैश्वानरस्य च.. ( ३९)
आप गाए जाते हैं, प्रकाशित हैं, भासित व ज्योतिष हैं. आप की कृपा से सारे
लोकों, वैश्वानर और बल को हम समझ सके हैं. ( ३९ )
अग्निर्ज्योतिषा ज्योतिष्मान् रुक्मो वर्चसा वर्चस्वान्.
सहस्रदा ऽ असि सहस्राय त्वा.. (४०)
हे अग्नि! आप ज्योति से ज्योतिष्मान हैं. आप वर्चस्व से वर्चस्वी हैं. आप हजारों
के लिए हजार वैभव देने वाले हैं. ( ४० )
आदित्यं गर्भं पयसा समङ्ग्धि सहस्रस्य प्रतिमां विश्वरूपम्.
परि वृङ्ग्धि हरसा माभि म १४ स्था: शतायुषं कृणुहि चीयमान:... (४१)
आप आदित्य के गर्भ को दूध से सींचिए. आप हजारों रूपों वाले हैं. आप
अपने तेज से रोगों का नाश कीजिए. आप यजमान को शतायु और उसे अहंकार से
मुक्त कीजिए. ( ४१ )
वातस्य जूतिं वरुणस्य नाभिमश्वं जज्ञान १४ सरिरस्य मध्ये.
शिशुं नदीना १४ हरिमद्रिबुध्नम्ग्ने मा हि १४ सी: परमे व्योमन्.. (४२)
हे अग्नि! आप वायु के प्रिय, वरुण देव की नाभि, ज्ञान के अश्व और जल
के बीच रहते हैं. आप नदियों के शिशु, हरे, जलमय व पर्वत पर चिह्न अंकित करने
वाले हैं. आप परम व्योमवासी हैं. आप हिंसा मत कीजिए. ( ४२ )
अजस्रमिन्दुमरुषं भुरण्युमग्निमीडे पूर्वचित्तिं नमोभि:.
स पर्वभिऋतुशः कल्पमानो गां मा हि १४ सीरदितिं विराजम्.. (४३)
हे अग्नि! आप अजस्र, शांतिदायी, ऊर्जावान और ऋषियों द्वारा सेवित हैं. आप
अन्न से भरणपोषण करने वाले हैं. हम पूर्व से ही मन से आप को नमन करते हैं.
आप पर्वों और ऋतु के अनुसार फलते हैं. आप गौ के समान पोषण करते हैं. आप
हिंसा मत कीजिए. आप विराजने की कृपा कीजिए. ( ४३ )
१६६ - यजुर्वेद