यजुर्वेद संहिता (सरल हिन्दी भावार्थ सहित)
Yajurveda Samhita with Hindi Translation
by डा. रेखा व्यास
Source: संस्कृत साहित्य प्रकाशन · संस्कृत साहित्य प्रकाशन (origin)
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Read in contextपूर्वार्ध तेरहवां अध्याय
गवयमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
गवयं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (४९)
हे अग्नि! यह अदिति हजारों सैकड़ों धाराओं का मूल स्रोत है. शरीर के बीच
में घी छोड़ने वाली है. घृत का दोहन करने वाली है. परम व्योम में स्थित है. आप
अदिति के प्रति हिंसा न कीजिए. जंगली जानवरों की ओर आप को निर्देश दिया
जाता है. आप अपने तन की बढ़ोत्तरी करते हुए उन के साथ विराजिए. जिन से हम
द्वेष करते हैं, ऐसों के प्रति आप अपना क्रोध प्रकट कीजिए. ( ४९ )
इममूर्णायुं वरुणस्य नाभिं त्वचं पशूनां द्विपदां चतुष्पदाम्.
त्वष्टुः प्रजानां प्रथमं जनित्रमग्ने मा हि १४ सीः परमे व्योमन्.
उष्ट्रमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
उष्ट्रं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (५०)
हे अग्नि! आप सर्वप्रथम उत्पन्न हैं. आप वरुण देव की नाभि, पशुओं, दोपायों
व चौपायों की त्वचा हैं. आप परम व्योम में स्थित हैं. आप हमारे प्रति हिंसक मत
होइए. हम जंगली ऊंटों की ओर आप को निर्देश करते हैं. आप उन के साथ अपने
तन की बढ़ोत्तरी कीजिए. आप उन ऊंटों के प्रति और जो हमारे प्रति द्वेष रखते हैं,
उन के प्रति क्रोध कीजिए. ( ५० )
अजो ह्यग्नेरजनिष्ट शोकात्सो अपश्यज्जनितारमग्रे.
तेन देवा देवतामग्रमायँस्तेन रोहमायन्नुप मेध्यासः.
शरभमारण्यमनु ते दिशामि तेन चिन्वानस्तन्वो निषीद.
शरभं ते शुगृच्छतु यं द्विष्मस्तं ते शुगृच्छतु.. (५१)
अग्नि ने अज ( बकरा ) को बनाया है. उसी से वह आगे देख सका है. उसी से
देवता देवत्व और उसी मेध से यजमान स्वर्ग को पाते हैं. आप जंगली शरभ
( जानवर ) का अनुकरण कीजिए. आप उस दिशा में बढ़िए. आप शरभ और जिन
से हम द्वेष रखते हैं, उन पर क्रोध कीजिए. ( ५१ )
त्वं यविष्ठ दाशुषो नॄः पाहि शृणुधी गिरः. रक्षा तोकमुतत्मना.. (५२)
हे अग्नि! आप युवा हैं. आप हमारी वाणीमय उपासनाओं को सुनिए. आप
हमारी, यजमानों और हमारी पीढ़ियों की रक्षा कीजिए. ( ५२ )
अपां त्वेमन्त्सादयाम्यपां त्वोद्मन्त्सादयाम्यपां त्वा भस्मन्त्सादयाम्यपां त्वा ज्योतिषि
सादयाम्यपां त्वायने सादयाम्यर्णवे त्वा सदने सादयामि समुद्रे त्वा सदने सादयामि
सरिरे त्वा सदने सादयाम्यपां त्वा क्षये सादयाम्यपां त्वा सधिषि सादयाम्यपां त्वा
सदने सादयाम्यपां त्वा सधस्थे सादयाम्यपां त्वा योनौ सादयाम्यपां त्वा पुरीषे
सादयाम्यपां त्वा पाथसि सादयामि. गायत्रेण त्वा छन्दसा सादयामि त्रैष्टुभेन त्वा
१६८ - यजुर्वेद