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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 66 of 314

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Page 66

५२ वेदान्तसार
तदज्ञानमिति प्राज्ञा लक्षणं संप्रचक्षते॥ (चित्सुखी-1/9)
अर्थात् अज्ञान अनादि और भावरूप है। इसकी भावरूपता इसी बात से
सिद्ध होती है कि ज्ञान के उत्पन्न होने पर यह विलीन हो जाता है।
इसके अतिरिक्त प्रत्यक्ष आदि प्रमाणों के आधार पर भी इसकी
भावरूपता का प्रतिपादन किया गया है, क्योंकि 'मैं अज्ञ हूँ', 'मैं किसी को
नहीं जानता हूँ' इस रूप में प्रत्यक्ष-अनुभवप्रतीति ही अज्ञान की भावरूपता
को सिद्ध करती है-
प्रत्यक्षं तावदहमज्ञः, अन्यं च न जानामि इत्यपरोक्षावभासदर्शनात्
(पञ्चपादिका विवरण-प्रकाशात्मयति-पृ० 74)
इसीप्रकार अनुमान एवं अर्थापत्तिप्रमाण द्वारा भी इसकी भावरूपता का
प्रतिपादन विद्वानों द्वारा किया गया है। 'मायां तु प्रकृतिं विद्यात् (श्वेताश्वतरो
4/10) इत्यादि श्रुतिवाक्य भी इसकी भावरूपता को ही सिद्ध करते हैं।
(न) यत्किञ्चित्-यद्यपि अज्ञान त्रिगुणात्मक एवं भावरूप है तथापि
इसके सम्बन्ध में 'इदमित्थम्' यह ऐसा ही है, यह नहीं कहा जा सकता है।
इसीलिए वेदान्ताचार्यों ने 'यत्किञ्चित्' कहकर इसके स्वरूप को स्पष्ट करने
का प्रयास किया है। वस्तुतः यही अज्ञान की विलक्षणता एवं अनिर्वचनीयता
भी है। अधिकांश वेदान्ती ब्रह्म को अज्ञान का आश्रय मानते हैं।
(४) अज्ञान के भेद-अद्वैतवेदान्त में उपाधिभेद के आधार पर
व्यावहारिक दृष्टि से अज्ञान के दो भेद माने गए हैं (अ) समष्टिरूप अज्ञान
(ब) व्यष्टिरूप अज्ञान। यहाँ समष्टि से अभिप्राय एक से है तथा व्यष्टि
द्वारा अनेक में आशय ग्रहण किया गया है। जैसे-समष्टिरूप में कहने की
इच्छा से वृक्षों के समूह को वन तथा व्यष्टिरूप में कथन की अभिलाषा से
अलग-अलग वृक्ष को आम, जामुन, पीपल आदि शब्दों से व्यवहृत किया
जाता है। इसीप्रकार समष्टिगत अनेक जलकणों के समूह को 'जलाशय'
तथा व्यष्टिरूप में एक-एक जलकण अथवा वापी, कूप, तडाग आदि अनेक
नामों से पृथक्-पृथक् व्यवहार करते हैं। ठीक उसीप्रकार अन्तःकरण की
उपाधियों से नानारूप में प्रतीत हो रहे जीवगत अज्ञानों की समष्टि के
अभिप्राय से अनेक अज्ञान इसप्रकार का व्यवहार किया जाता है। वास्तव में
अज्ञान एक ही है। केवल उपाधिभेद के कारण उसके लिए एकत्व और
अनेकत्व का व्यवहार होता है।