Skip to content
SarvaKosh
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 65 of 314

Read in context
Page 65

भूमिका ५१
साङ्गाप्यनङ्गाप्युभयात्मिका नो
महाद्भुतानिर्वचनीयरूपा॥ (विवेक चूडामणि, 111)
‘अर्थात् माया न सत् है, न असत् है तथा सत्-असत् के रूप में
उभयात्मक भी नहीं है। यह न साङ्ग है न अङ्गरहित है न उभयरूप ही है,
अपितु यह अत्यन्त अद्भुत तथा अनिर्वचनीयरूप है।’
(ब) त्रिगुणात्मिका-वेदान्त, माया अथवा अज्ञान को सत्त्वगुण, रजोगुण
एवं तमोगुण से युक्त मानता है। जिसे यह श्रुति¹ स्मृति² एवं अनुभव के
आधार पर सिद्ध करता है। सत्कार्यवाद के सिद्धान्त के अनुसार कार्य में
दिखायी देने वाले गुण कारण में भी विद्यमान रहते हैं। अतः अज्ञान अथवा
माया से उत्पन्न होने वाले तेज में लोहित, जल में शुक्ल तथा पृथिवी
(अन्न) में कृष्ण गुण विद्यमानं हैं। वेदान्त इसी सिद्धान्त को मान्यता प्रदान
करता है। इस विषय में छान्दोग्योपनिषद् में भी उल्लेख है-
“यदग्ने रोहितं रूपं तेजसस्तद्रूपं यच्छुक्लं तदपां यत् कृष्णं तदन्नस्य”
(6/4/1) अतः अज्ञान अथवा माया की त्रिगुणात्मकता सिद्ध होती है।
(स) ज्ञानविरोधी-वेदान्तदर्शन तमोगुण-प्रधान आवरण एवं विक्षेप
शक्तिद्वय से युक्त अज्ञान से उपहित (आवृत) चैतन्य अर्थात् ब्रह्म से सृष्टि
की उत्पत्ति मानता है। अतः अज्ञान ही सृष्टि का मूलकारण है। यहाँ
एकमात्र ब्रह्म ही सत्य है, दृश्यमान यह सम्पूर्णजगत् मिथ्या है।³ अज्ञान ब्रह्म
के साक्षात्कार में बाधक है। इसलिए इसे ज्ञानविरोधी कहा गया है, क्योंकि
श्रवण, मनन, निदिध्यासन आदि साधनों का अनुष्ठान करता हुआ साधक
जब ब्रह्म का साक्षात्कार कर लेता है तो उसका अज्ञान निवृत्त हो जाता है।
अतः माया अथवा अज्ञान को ज्ञान के माध्यम से बाधित किया जा सकता
है। ठीक उसीप्रकार जैसे सूर्य के प्रकाश द्वारा अंधकार दूर हो जाता है।
(द) भावरूप- अद्वैतवेदान्त अज्ञान को भावरूप स्वीकार करता है।
इस विषय में चित्सुखाचार्य का कथन है-
अनादि भावरूपं यद् विज्ञानेन विलीयते।

  1. देवात्मशक्तिं स्वगुणैर्निगूढाम् (श्वेताश्वतरोपनिषद्-1/3)।
  2. देवी ह्येषा गुणमयी मम माया दुरत्यया।
    मामेव ये प्रपद्यन्ते मायामेतां तरन्ति ते। (श्रीमद्भगवद्गीता 7/14)
  3. ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या।