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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 67 of 314

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Page 67

भूमिका ५३
(५) अज्ञान की शक्तियाँ-अज्ञान की आवरण और विक्षेप नामक
दो शक्तियाँ मानी गई हैं। इनमें आवरणशक्ति द्वारा वस्तु के वास्तविक एवं
सत्यरूप को आच्छादित कर दिया जाता है तथा विक्षेपशक्ति उसमें अनेक
प्रकार के अवास्तविकरूपों का आभास कराती है। जिसे यहाँ रज्जु में सर्प
की भ्रान्ति द्वारा समझाया गया है। तदनुसार अन्धकार में पड़ी हुई रस्सी में
अज्ञान की प्रथम आवरणशक्ति द्वारा उसके वास्तविक एवं सत्यरूप रज्जु को
पहले आच्छादित किया जाता है। तत्पश्चात् अज्ञान की द्वितीय विक्षेपशक्ति
द्वारा अपने सामर्थ्य से उसमें अवास्तविक एवं असत्यरूप सर्प का आभास
कराया जाता है।
ठीक इसीप्रकार अज्ञान की आवरणशक्ति ब्रह्म अथवा आत्मा के
वास्तविकस्वरूप को आच्छादित कर लेती है। तत्पश्चात् इसकी विक्षेपशक्ति
द्वारा इसमें आकाशादि सृष्टिप्रपञ्च की उद्भावना कर दी जाती है। इसप्रकार
सूक्ष्मशरीर से लेकर स्थूलब्रह्माण्ड पर्यन्त नामरूपात्मकजगत् की रचना इसी
विक्षेपशक्ति द्वारा की जाती है। यह सम्पूर्णसृष्टि वस्तुतः पानी के बुलबुले के
समान नाशवान् है। इसी आधार पर यहाँ 'ब्रह्मसत्यं जगन्मिथ्या' का उद्घोष
किया गया।
इसके अतिरिक्त आत्मा को कर्तृत्व, भोक्तृत्व एवं सुखदुः खमोहात्मक
इत्यादि सांसारिक तुच्छभावनाओं का अनुभव भी इसी विक्षेपशक्ति के कारण
होता है। जिसप्रकार प्रकाश पड़ने पर व्यक्ति की सर्पविषयक कल्पना
विलीन हो जाती है। ठीक उसीप्रकार ज्ञान होने पर जगत् की सत्य
परिकल्पना एवं आत्मा के कर्तृत्व आदि की भावना भी विनष्ट हो जाती है।
अतः आत्मा के कर्तृत्व की भावना संसार की वास्तविक प्रतीति दोनों ही
रस्सी में सर्पत्व की भावना के समान पूर्णतया मिथ्या है। इसी अभिप्राय को
भगवद्गीता में इसप्रकार कहा गया है-
"न कर्तृत्वं न कर्माणि लोकस्य सृजति प्रभुः" (5/14)
इसप्रकार यह स्पष्ट है कि अज्ञान आवरण एवं विक्षेपशक्ति द्वारा अपने
आश्रय आत्मा अथवा ब्रह्म का बल प्राप्त करके उसके स्वयं प्रकाशत्व को
आच्छादित कर उसमें ईश्वर, जीव, जगत् की आकृति के रूप में रज्जु में
सर्प के समान मिथ्याप्रपञ्च की सृष्टि करता है।¹

  1. आच्छाद्य विक्षिपति संस्फुरदात्मरूपं जीवेश्वर जगदाकृतिभिर्मृषैव।
    'अज्ञानमावरणविभ्रमशक्तियोगादात्मत्वमात्रविषयाश्रयताबलेन।। (संक्षेपशारीरक 1/20)