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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 44 of 314

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३० वेदान्तसार
किया है तथा मधुसूदनसरस्वती एवं स्वामीरामतीर्थ ने इस ग्रन्थ पर टीकाएँ
भी लिखी हैं।
(२५) आचार्य वाचस्पतिमिश्र-इनका जन्मस्थान मिथिला माना जाता
है। इनके ग्रन्थों से प्रतीत होता है कि ये अपने विषय के धुरन्धर विद्वान्
तथा अद्वैतमत के प्रमुख आचार्य थे। विद्वानों ने इनका समय आठवीं शताब्दी
के अन्त से लेकर नवम शती का प्रारम्भ निर्धारित किया है। इनके बाद के
प्रायः सभी आचार्यों ने इनके वाक्यों को प्रमाणरूप में स्वीकार किया है।
इन्होंने शङ्करभाष्य पर भामती टीका का प्रणयन किया। शङ्करमत को समझाने
हेतु इसका अध्ययन अनिवार्य माना जाता है। इनके वैदुष्य से प्रभावित होकर
इन्हें राजसम्मान की प्राप्ति हुई।
कहते हैं ये ग्रन्थ लिखने में इतने अधिक तल्लीन रहते थे कि इन्हें
अपने आसपास का भी कोई भान नहीं रहता था। जब ये शारीरकभाष्य की
टीका लिख रहे थे तो कमरे में दीपक बुझ गया। तब इनकी धर्मपत्नी
भामती ने कमरे में आकर वह दीपक जलाया। उसीसमय इनका परिचय
अपनी पत्नी से हुआ, तभी पत्नी ने अपने पातिव्रत्य से इन्हें परिचित कराया
तो उससे प्रभावित होकर इन्होंने अपनी टीका का नाम 'भामती' रखने का
निश्चय करके अपनी पत्नी को सदैव के लिए अमर बना दिया।
वाचस्पतिमिश्र ने छहों दर्शनों पर अपनी टीकाएँ लिखीं। उन्होंने वेदान्त
पर 'भामती', सुरेश्वरकृत ब्रह्मसिद्धि पर 'ब्रह्मतत्त्वसमीक्षा', सांख्यकारिका पर
'तत्त्वकौमुदी' पातञ्जलदर्शन पर 'तत्त्ववैशारदी', न्यायदर्शन पर 'न्यायवार्तिक-
तात्पर्य', पूर्वमीमांसादर्शन पर 'न्यायसूचीनिबन्ध, भाट्टमत पर 'तत्त्वबिन्दु' तथा
मण्डनमिश्र के विधिविवेक पर 'न्यायकणिका' नामक टीका की संरचना की।
इनके ग्रन्थों में तत्तत् आचार्य के सिद्धान्तों का निष्पक्षभाव से समर्थन के
साथ-साथ, उनमें मौलिकता के दर्शन भी होते हैं। शाङ्करसिद्धान्त के प्रचार
में इनका बहुत बड़ा हाथ माना जाता है। ये विद्वान् ही नहीं, अपितु
उच्चकोटि के साधक भी थे।
(२६) श्रीकृष्णमिश्र यति-नवम एवं दशम शती तक वेदान्त विषयक
चर्चा विद्वानों तक सीमित थी, किन्तु इसका प्रभाव बढ़ने के कारण
धीरे-धीरे यह सर्वसाधारण में भी लोकप्रिय होने लगी। इस दृष्टि से
ग्यारहवीं शती में नाटक-काव्यादि के माध्यम से वेदान्तदर्शन को समझाने