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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 43 of 314

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भूमिका २९
(२३) आचार्यमण्डनमिश्र-इनका अन्य नाम सुरेश्वराचार्य भी था। ये
रेवा नदी के तटवर्ती प्राचीन महिष्मती के निवासी थे। मण्डनमिश्र अपने
समय के मगधप्रदेश के सबसे बड़े विद्वान् और पूर्वमीमांसक थे। ऐसी
मान्यता है कि पहले ये कुमारिलभट्ट के शिष्य थे तथा उन्होंने ही
शङ्कराचार्य को इनसे शास्त्रार्थ करने के लिए भेजा था। आचार्य शङ्कर ने
इनके घर पर पहुँच कर इनसे शास्त्रार्थ किया तथा शास्त्रार्थ में इन्हें परास्त
किया। अतः शर्त के अनुसार शङ्कराचार्य का शिष्यत्व ग्रहण करके ये
संन्यासी हो गए तथा विश्वरूप एवं सुरेश्वराचार्य के नाम से प्रसिद्ध हुए।
शङ्कराचार्य ने बाद में शृंगेरी मठ की स्थापना करके इन्हें वहाँ का
आचार्य नियुक्त किया। सुरेश्वराचार्य पाण्डित्य के अगाध सागर थे। उनके
ग्रन्थों में विचारों की प्रौढ़ता एवं क्रमबद्धता देखने को मिलती है। चित्सुख,
विद्यारण्य, सदानन्द, गोविन्दानन्द, अप्पयदीक्षित आदि परवर्ती आचार्यों ने
उनके वचनों को अपने ग्रन्थों में प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है।
संन्यास ग्रहण करने से पहले इन्होंने आपस्तम्बीय मण्डनकारिका,
भावनाविवेक एवं काशीमोक्षनिर्णय नामक ग्रन्थों की रचना की तथा उसके
पश्चात् इन्होंने तैत्तिरीयश्रुतिवार्तिक, नैष्कर्म्यसिद्धि, इष्टसिद्धि, पञ्चीकरण-
वार्तिक, बृहदारण्यकोपनिषद्वार्तिक, ब्रह्मसिद्धि, ब्रह्मसूत्रभाष्यवार्तिक,
विधिविवेक, मानसोल्लास, लघुवार्तिक, वार्तिकसार तथा वार्तिकसारसंग्रह
ग्रन्थों की संरचना की। संन्यास ग्रहण करने के बाद इन्होंने शङ्करमत का ही
प्रचार किया तथा अपने ग्रन्थों में भी उन्हीं के मत का समर्थन किया।
(२४) सर्वज्ञात्ममुनि-शङ्कराचार्य द्वारा स्थापित शृंगेरीमठ की गद्दी पर
आठवीं शताब्दी के अन्त में इन्हें पदस्थापित किया गया। इनका दूसरा नाम
नित्यबोधाचार्य था। शङ्करमत के प्रचार की दृष्टि से इन्होंने 'संक्षेपशारीरक'
ग्रन्थ की संरचना की। इनके गुरु का नाम देवेश्वराचार्य था। मधुसूदन
सरस्वती एवं स्वामीरामतीर्थ ने सुरेश्वराचार्य से इसकी अभिन्नता प्रतिपादित
की है। जो कालक्रम की दृष्टि से संगत प्रतीत नहीं होता।
शृंगेरीमठ के प्राचीनलेखों से इनका स्थितिकाल 758 ई० से 848 ई०
प्रतीत होता है। ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य के आधार पर लिखे गए 'संक्षेपशारीरक'
में श्लोक एवं वार्तिक दोनों की संरचना की गई है। चार अध्यायों में
विभक्त इस ग्रन्थ के प्रथम अध्याय में 562, द्वितीय में 248, तृतीय में 365
तथा चतुर्थ में 53 श्लोक हैं। परवर्ती आचार्यों ने इसे प्रमाणरूप में स्वीकार