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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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भूमिका ३१
का प्रयास आरम्भ हुआ, क्योंकि काव्यादि सर्वसाधारण पर गद्य की अपेक्षा
अधिक प्रभावशाली होते हैं। साथ ही ये सुबोध भी होते हैं।
अतः अद्वैतमत का प्रचार करने की दृष्टि से श्रीकृष्णमिश्र ने
'प्रबोधचन्द्रोदय' नामक नाटक की संरचना की। इनका काल ग्यारहवीं शती
का उत्तरार्द्ध माना जाता है। ये एक संन्यासी थे। इनके द्वारा विरचित नाटक
के माध्यम से ही इनकी कवित्व शक्ति एवं दार्शनिकप्रतिभा का परिचय
प्राप्त होता है।
(२७) प्रकाशात्मयति-ग्यारहवीं शती में आचार्य रामानुज ने शाङ्कर मत
का जोरदार खण्डन किया। उसीसमय इन्होंने शांकरमत की प्रस्थापना का
प्रयास किया। इन्होंने पद्मपादाचार्य द्वारा विरचित पञ्चपादिका पर
'पञ्चपादिकाविवरण' नामक टीका का प्रणयन किया। अद्वैतसिद्धान्त की
दृष्टि से यह टीका अत्यन्त महत्त्वपूर्ण स्थान रखती है, क्योंकि परवर्ती
आचार्यों ने अनेकशः इसके वाक्यों को प्रमाणरूप में उद्धृत किया है।
विद्वानों ने इनका स्थितिकाल दसवीं शताब्दी एवं तेरहवीं शताब्दी के मध्य
निर्धारित किया है। इनके गुरु का नाम अनन्यानुभव था। इनके ग्रन्थों से पता
चलता है कि इनके गुरु को ब्रह्म का साक्षात्कार हुआ था। इनका दूसरा नाम
प्रकाशानुभव था।
(२८) आचार्य अद्वैतानन्द- इनका जन्म 1149 ई० में दक्षिणभारत में
स्थित कावेरीनदी के तट पर पञ्चनद नामक स्थान में हुआ। इनके पिता
प्रेमनाथ तथा माता पार्वती देवी थीं। कौण्डिन्य गोत्र में उत्पन्न इनका पूर्वनाम
सीतानाथ था। इन्होंने सत्रह वर्ष की आयु में संन्यास ग्रहण किया। काञ्ची
स्थित शारदामठ के अध्यक्ष भूमानन्द (चन्द्रशेखरेन्द्र सरस्वती) इनके गुरु थे।
जिन्होंने लगभग 1166 ई० में अद्वैतानन्द को अपने स्थान पर नियुक्त करके
काशी के लिए प्रस्थान किया।
संन्यास लेने से पूर्व ही अद्वैतानन्द ने न्याय एवं मीमांसादर्शन में पर्याप्त
निपुणता प्राप्त कर ली थी। स्वामीरामानन्द से इन्होंने शारीरकसूत्रभाष्य का
अध्ययन किया, इनके प्रति अद्वैतानन्द की अगाध श्रद्धा थी। 33 वर्षों तक
मठ के अध्यक्ष पद पर रहने के पश्चात् 50 वर्ष की आयु में इन्होंने सन्
1199 ई० में समाधि ग्रहण की। इन्हें चिद्विलास एवं आनन्दबोधाचार्य के नाम
से जाना जाता है।