वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context२४ वेदान्तसार
के सिद्धित्रय में आये 'भाष्यकृत' शब्द का सम्बन्ध इन्हीं द्रविडाचार्य से
माना है—
“भगवता बादरायणेन इदमर्थमेव सूत्राणि प्रणीतानि विवृतानि च
परिमितगम्भीरभाष्यकृता” (सिद्धित्रय-यामुनाचार्य)
(१९) गौडपादाचार्य—इन्हें अद्वैतवेदान्त का प्रथम प्रवर्तक एवं प्रधान
आचार्य माना गया है, क्योंकि अद्वैतवेदान्त की गुरुपरम्परा अत्यन्त प्राचीन
होते हुए भी इसके सिद्धान्तों का क्रमबद्धरूप में प्रस्थापन एवं प्रतिपादन
इन्हीं के द्वारा किया गया। कुछ विद्वानों ने इन्हें बौद्धदर्शन से प्रभावित माना
है। इनके जीवन के सम्बन्ध में कुछ विशेषबात नहीं मिलती, किन्तु
शङ्कराचार्य के शिष्य सुरेश्वराचार्य के नैष्कर्म्यसिद्धि नामक ग्रन्थ से केवल
इतना ज्ञात होता है कि ये गौड़प्रदेश के निवासी थे। विद्वानों ने इन्हें ईसा
पूर्व द्वितीय शताब्दी के पूर्वभाग में स्थित माना है, जिसका आधार इनके
ग्रन्थों में बौद्धमत का स्पष्टरूप से उल्लेख न होना रहा है।
इन्होंने माण्डूक्योपनिषद् पर प्रसिद्ध कृति 'माण्डूक्यकारिका' की संरचना
की। जिसपर शङ्कराचार्य ने भाष्य की रचना की तथा इसी कारिका पर
मिताक्षरा नामक टीका भी मिलती है। परवर्ती आचार्यों ने इस कारिका को
प्रमाणरूप में स्वीकार किया है। इस ग्रन्थ को चार प्रकरणों में विभाजित
किया गया है (1) आगम (2) वैतथ्य (3) अद्वैत (4) अतीत शान्ति।
इनका दूसरा ग्रन्थ 'उत्तरगीताभाष्य' मिलता है। उत्तरगीता महाभारत का
ही एक अंश है, किन्तु यह अंश महाभारत की सभी प्रतियों में उपलब्ध
नहीं होता। ईश्वरकृष्ण की सांख्यकारिका पर भी आचार्य गौडपाद का भाष्य
उपलब्ध है,¹ किन्तु विद्वानों ने इन्हें पूर्वगौडपाद से भिन्न माना है, क्योंकि
सांख्यकारिका के भाष्यकार आचार्य गौडपाद का समय ईसा की सप्तम
शताब्दी माना गया है।²
आचार्य गौडपाद अद्वैतवाद के प्रमुख आचार्य थे। अपनी कारिकाओं में
उन्होंने जिन सिद्धान्तों को बीजरूप में प्रदर्शित किया, उन्हीं को आचार्य
शङ्कर ने अपने ग्रन्थों में सरलशैली में प्रतिपादित किया। कारिकाओं में
निर्दिष्ट उनके मत को विद्वानों ने 'अजातवाद' की संज्ञा प्रदान की।
- लेखककृत सांख्यकारिका 'चन्द्रिका' व्याख्या- संस्कृत ग्रन्थागार, दिल्ली-1998
- वही, भूमिका, पृ० 33