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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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भूमिका २३
जिसप्रकार मृत्यु के पश्चात् स्वर्ग की प्राप्ति होती है। उसीप्रकार देह छूटने
के पश्चात् ही मोक्ष भी सम्भव है।
(१७) आचार्य भारुचि-आचार्य रामानुज ने अपने वेदान्तसंग्रह में पृ०
154 पर प्राचीन वेदान्ताचार्यों का उल्लेख करते हुए इनके नाम का सर्वप्रथम
उल्लेख किया है। इन आचार्यों के नाम हैं-भारुचि, टङ्क, बोधायन, गुहदेव,
कपर्दिक तथा द्रमिलाचार्य। इसीप्रकार विज्ञानेश्वर की मिताक्षरा टीका में
(1/18, 2/124) माधवाचार्य की पराशर संहिता टीका में (2/3, पृ० 510)
तथा सरस्वतीविलास आदि ग्रन्थों में आचार्य भारुचि के नाम का कथन
किया गया है।
मिताक्षरा का समय विद्वानों ने 1050 ई० निर्धारित किया है। अतः इनका
काल इससे पूर्व सिद्ध होता है। डा० पी० वी० काणे ने धर्मशास्त्र के इतिहास
में इनका समय नवीं शताब्दी का पूर्वार्द्ध माना है।¹ श्री निवासदास ने
यतीन्द्रमत दीपिका में अन्य वेदान्ताचार्यों के नामोल्लेख के प्रसङ्ग में इनका
भी कथन किया है। ऐसा प्रतीत होता है कि इन्होंने आचार्य विष्णुकृत
धर्मसूत्र के ऊपर टीका की संरचना की थी। कुछ विद्वान् धर्मशास्त्रकार
भारुचि तथा वेदान्ताचार्य भारुचि को भिन्न मानते हैं, किन्तु काणे महोदय ने
दोनों के एक होने की सम्भावना व्यक्त करते हुए इन्हें विश्वरूप का
समकालीन माना है।²
(१८) द्रविडाचार्य-ये भी प्राचीन वेदान्ताचार्य थे। इन्होंने
छान्दोग्योपनिषद् पर अत्यन्त वृहद्भाष्य की संरचना की। साथ ही
बृहदारण्यकोपनिषद् पर भी भाष्य लिखा। अपने माण्डूक्योपनिषद् भाष्य में
(2/32, 2/20) आचार्य शङ्कर ने इन्हें 'आगमवित्' कहकर सम्मानित किया
है तथा बृहदारण्यकोपनिषद् भाष्य में 'सम्प्रदायवित्' कहकर सम्बोधित किया
है। इन सम्बोधनों से तात्कालिक समय के दार्शनिक विद्वानों में इनके गौरव
की अभिव्यक्ति होती है। यही कारण है कि शङ्कराचार्य ने कहीं भी इनके
मत का खण्डन नहीं किया है। इनका दूसरा नाम द्रमिलाचार्य भी मिलता है।
ये अद्वैतमत के समर्थक थे। इसके अतिरिक्त रामानुजाचार्य ने अपने
वेदान्तसंग्रह में भी इनके नाम का उल्लेख किया है। विद्वानों ने यामुनाचार्य

  1. धर्मशास्त्र का इतिहास-पी० वी० काणे- पृ० 68 प्रथम भाग-हिन्दी अनुवाद।
  2. वही