वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
DevanagariSanskritpublished314 pages
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२२ वेदान्तसार
ग्रन्थ से भी यह बात सिद्ध होती है कि इनके द्वारा निर्मित वेदान्तवृत्ति का
नाम कृतकोटि था (प्रपञ्चहृदय-त्रिवेन्द्रम्-पृ० 39) अनेक विद्वानों ने इन्हें
द्रविड़ देश का निवासी स्वीकार किया है।¹
(१४) आचार्य टङ्क-आचार्य रामानुज ने वेदान्तसंग्रह में इनके नाम का
उल्लेख किया है। ये विशिष्टाद्वैत सिद्धान्त के समर्थक थे। कुछ विद्वान्
ब्रह्मनन्दी आचार्य के साथ इनकी अभिन्नता का प्रतिपादन करते हैं, किन्तु
इस विषय में निश्चितरूप से कुछ भी कहना कठिन है।
(१५) आचार्य ब्रह्मनन्दी-आचार्य मधुसूदन सरस्वती ने संक्षिप्त
शारीरक टीका में (3/117) इनके नाम का उल्लेख किया है। ऐसा प्रतीत
होता है कि ये सम्भवतः अद्वैतवेदान्त के आचार्य थे तथा प्राचीन वेदान्त
साहित्य में छान्दोग्य वाक्यकार अथवा केवल वाक्यकार के नाम से प्रसिद्ध
थे, क्योंकि इन्होंने वाक्य नामक छान्दोग्यव्याख्यान की संरचना की थी।
जिसपर द्रमिडाचार्य ने भाष्य लिखा। जैसा कि हम पूर्व में उल्लेख कर चुके
हैं, कुछ विद्वानों ने आचार्य टङ्क के साथ इनकी अभिन्नता प्रतिपादित की है।
(१६) आचार्य ब्रह्मदत्त-शङ्कराचार्य के पूर्ववर्ती वेदान्ताचार्यों में इनके
नाम का उल्लेख भी प्राप्त होता है। ये अद्वैतवादी आचार्य थे
(नैष्कर्म्यसिद्धि-1/68)। शङ्कराचार्य ने बृहदारण्यकोपनिषद् (1/4/7) के
भाष्य में भी इनके मत का उल्लेख किया है। प्राचीन वेदान्ताचार्य आश्मरथ्य
के भेदाभेद के सिद्धान्त से इनके मत की अनुकूलता प्रतीत होती है, क्योंकि
उन्होंने ब्रह्म से जीव की उत्पत्ति तथा मुक्ति की स्थिति में उसका उसी में
लीन होना स्वीकार किया है। जबकि ब्रह्मदत्त ने भी जीव की उत्पत्ति एवं
विनाश की स्थिति को मान्यता प्रदान की है।
इनके अनुसार-अज्ञान की निवृत्ति भावनाजन्य ज्ञान से ही होती है,
औपनिषदिकज्ञान मुक्ति के लिए पर्याप्त नहीं है, क्योंकि इस ज्ञान के प्राप्त
करने के पश्चात् भी जीवनपर्यन्त भावना आवश्यक है। इनके मत में-शरीर
के रहने पर भी उपाय के माध्यम से देवता का साक्षात्कार सम्भव है, किन्तु
उसके साथ मिलन देह के अभाव में ही सम्भव है। इसप्रकार प्रारब्धकर्मों से
प्राप्त की हुई देह उपास्य के साथ उपासक के मिलन में बाधक है।²
- प्राचीन चरित्रकोश, पृ. 525
- बृहदारण्यकोपनिषद् वार्तिक-पृ0 1357 तथा नैष्कर्म्यसिद्धिटीका-‘चन्द्रिका’-पृ0 1-67