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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

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भूमिका २१
उनके अनुसार-व्याकरण के सिद्धान्तों के अध्ययन एवं मनन द्वारा मोक्ष
की प्राप्ति की जा सकती है। इनके परवर्ती आचार्य, मण्डनमिश्र ने इनके
सिद्धान्तों एवं मान्यताओं से प्रभावित होकर स्फोटसिद्धि नामक ग्रन्थ की
संरचना की। प्रो० मैक्समूलर ने आचार्य भर्तृहरि को ईसा की सप्तम शताब्दी
के पूर्वार्द्ध में स्थित माना है।
(12) आचार्य उपवर्ष-शङ्कराचार्य¹ एवं शबरस्वामी के भाष्य² में इनके
नाम का उल्लेख हुआ है। वहाँ इनके लिए सम्मानजनक 'भगवान्' शब्द का
प्रयोग तात्कालिक समय में इनके गौरव तथा श्रेष्ठता को सिद्ध करता है।
साथ ही इससे यह भी प्रतीत होता है कि इन्होंने पूर्वमीमांसा एवं
उत्तरमीमांसा दोनों पर ही अपनी विद्वत्तापूर्ण व्याख्या की संरचना की थी।
मणिमेखले नामक तमिलभाषा में लिखे गए एक प्राचीनग्रन्थ में आचार्य
जैमिनि तथा व्यास के साथ ही आठ प्रमाणों को मान्यता प्रदान करने वाले
'कृतकोटि' नामक आचार्य के नाम का उल्लेख हुआ है। इनके साथ उपवर्ष
आचार्य का सम्बन्ध स्थापित करने का विद्वानों ने प्रयास किया है। जो
न्यायसंगत प्रतीत नहीं होता, क्योंकि आचार्य उपवर्ष वस्तुतः अन्य मीमांसकों
एवं वेदान्तियों के समान केवल छः प्रमाणों को ही मान्यता प्रदान करते हैं।
आचार्य बलदेव उपाध्याय ने इन्हें 200 ई० के लगभग स्थित माना है।
(१३) आचार्य बौधायन-वेदार्थसंग्रह में गुरुदेव, कपर्दी, टङ्क तथा
आचार्य भारुचि के साथ इनके नाम का भी उल्लेख मिलता है। डॉ. थीबो
आदि विद्वानों का विचार है कि इन्होंने ब्रह्मसूत्र पर एक वृत्ति की संरचना
की थी। यद्यपि इस समय यह कृति उपलब्ध नहीं है तथापि रामानुजाचार्य
के श्रीभाष्य में इसके उद्धरण प्राप्त होते हैं। प्रसिद्ध जर्मन विद्वान् जैकोबी ने
इनका मीमांसासूत्र पर वृत्ति लिखना स्वीकार किया है।³ ये कल्पसूत्रों के
प्रवर्तक आचार्य बौधायन से भिन्न हैं। इसके अतिरिक्त प्रपञ्चहृदय नामक

  1. "इत एव चाकृष्याचार्येण शबरस्वामिना प्रमाणलक्षणे वर्णितम्। अत एव च
    भगवतोपवर्षेण प्रथमे तन्त्रे आत्मास्तित्वाभिधानप्रसक्तौ शारीरके वक्ष्याम
    इत्युद्धास्तुकृतः।" (ब्रह्मसूत्रशाङ्करभाष्य-3/3/53)
  2. अथ गौरित्यत्र शब्दः गकारौकारविसर्जनीयः इति भगवानुपवर्षः।
    (मीमांसा शबरभाष्य-1/1/5)
  3. जरनल ऑफ दॉ अमेरिकन ओरियण्टल सोसायटी-पृ0 17-191