वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextसमाधि-निरूपण २६७
निर्विकल्पकसमाधि है। तब तो जल के आकार से आकारित नमक के प्रतीत
न होने से जलमात्र की प्रतीति के समान, अद्वितीयवस्तु ब्रह्म के आकार से
आकारित के प्रतीत न होने से, अद्वितीयवस्तु ब्रह्ममात्र ही प्रकाशित होता है।
तब इसकी सुषुप्ति में अभेद की आशङ्का नहीं होती है, (क्योंकि) दोनों
स्थानों पर वृत्ति की अप्रतीति समान होने पर भी उनके सद्भाव एवं
असद्भावमात्र से इन दोनों में भेद की सिद्धि होती है।
‘चन्द्रिका'—सविकल्पक, निर्विकल्पक भेद से समाधि दो प्रकार की
होती है। इनमें प्रथम, सविकल्पक-समाधि की स्थिति में साधक को ज्ञाता,
ज्ञान और ज्ञेय इन तीनों का भेदज्ञान होते हुए भी 'अहं ब्रह्मास्मि' इसप्रकार
की अखण्ड आकार से आकारित स्थिति बनी रहती है। इसे समझाने के
लिए ग्रन्थकार मिट्टी के हाथी का उदाहरण प्रस्तुत करते हैं-जिसप्रकार
मिट्टी से बने हुए हाथी को देखने पर मिट्टी और हाथी दोनों का
अलग-अलग भान होते हुए भी, उसे 'यह हाथी है', ऐसा ही कहा जाता
है। जबकि वास्तविककारण उसमें मिट्टी ही होता है।
उसीप्रकार सविकल्पक, समाधि में ज्ञाता, ज्ञान और ज्ञेय की भेदप्रतीति
वस्तुतः वाणी का प्रपञ्चमात्र होता है। जबकि उसमें स्थित अद्वैत का प्रतीत
होना ही वास्तविकता होती है। इसी बात को स्पष्ट एवं प्रमाणित करने के
लिए ग्रन्थकार 'दृशिस्वरूपम्' इत्यादि कारिका प्रस्तुत करते हैं, जिसका
अभिप्राय है-
जो परब्रह्म साक्षिस्वरूप है। आकाश के समान सर्वत्र व्याप्त है। जो
पूर्णतया निर्लिप्त है। जो हमेशा एक ही रूप में प्रकाशमान रहता है अर्थात्
सूर्य अथवा चन्द्रमा आदि के समान, जिसका तेज कभी भी कम अथवा
अधिक नहीं होता है। जिसका कभी जन्म नहीं होता है। जिसका कभी
विनाश नहीं होता है। साथ ही जो अविद्या आदि दोषों से रहित है। जो
सर्वत्र विद्यमान रहता है तथा जो सजातीय अथवा विजातीय इसप्रकार के
भेद से रहित है, एक है। जो न कारण है, न कार्य है अर्थात् इसप्रकार की
दोनों उपाधियों से सर्वथा मुक्त है। परमानन्दस्वरूप वह ओ३म् इस नाम से
उच्चारण किया गया परब्रह्म ही है और वह और कोई नहीं, अपितु मैं
(साधक) ही हूँ।
प्रस्तुत प्रसङ्ग में यह उल्लेखनीय है कि यद्यपि उस परमब्रह्म की अनेक
उपाधियों का उल्लेख शास्त्रों में किया गया है, किन्तु वे सभी वाणी के