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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 280 of 314

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Page 280

२६६ वेदान्तसार
अलेपकं सर्वगतं यदद्वयं तदेव चाहं सततं विमुक्तमोम्” इति॥
निर्विकल्पकस्तु ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयापेक्षयाद्वितीयवस्तुनि तदाकारा-
कारितायाश्चित्तवृत्तेरतितरामेकीभावेनावस्थानम्। तदा तु जलाकारा-
कारितलवणानवभासेन जलमात्रावभासवदद्वितीयवस्वाकाराकारितचित्त-
वृत्त्यनवभासेनाद्वितीयवस्तुमात्रमवभासते। ततश्चास्य सुषुप्तेश्चाभेदशङ्का न
भवति। उभयत्र वृत्त्यभाने समानेऽपि तत्सद्भावासद्भावमात्रेणा-
नयोर्भेदोपपत्तेः॥३०॥
पदच्छेद-समाधिः द्विविधः सविकल्पकः निर्विकल्पकः च इति। तत्र
सविकल्पकः नाम ज्ञातृ-ज्ञानादि-विकल्प-लय-अनपेक्षया-अद्वितीयवस्तुनि तद्
आकार-आकारितायाः चित्तवृत्तेः अवस्थानम्। तदा मृण्मय-गजादिभाने अपि
मृद्भानवत् द्वैतभाने अपि अद्वैतं वस्तु भासते। तद उक्तम्-
“दृशिस्वरूपम् गगन-उपमम् परम् सकृद् विभातम् तु अजम् एकम्
अक्षरम्। अलेपकम् सर्वगतम् यद् अद्वयम् तद् एव च अहम् सततम् विमुक्तम्
ओम्”
निर्विकल्पकः तु ज्ञातृ-ज्ञानादि-विकल्प-लय-अपेक्षया-अद्वितीय वस्तुनि
तद् आकार-आकारितायाः चित्तवृत्तेः अतितराम् एकी भावेन अवस्थानम्। तदा
तु जल-आकार-आकारित-लवण-अनवभासेन जलमात्र-अवभासवद्-अद्वितीय
वस्तु-आकार-आकारित-चित्तवृत्ति-अनवभासेन अद्वितीयवस्तुमात्रम् अवभासते।
ततः च अस्य सुषुप्तेः च अभेदशङ्का न भवति। उभयत्र वृत्ति-अभाने समाने
अपि तत् सद्भाव-असद्भावमात्रेण अनयोः भेद-उपपत्तेः॥३०॥
अनुवाद-समाधि दो प्रकार की हैं-सविकल्पक एवं निर्विकल्पक। उनमें
ज्ञाता एवं ज्ञेय के भेद का लोप न होकर केवल अद्वितीयवस्तु के आकार से
आकारित चित्तवृत्ति की स्थिति ही सविकल्पक समाधि है। उस अवस्था में
मिट्टी के बने हाथी आदि की प्रतीति में मिट्टी के भान के समान द्वैत की
प्रतीति होते हुए भी, अद्वैतरूप वस्तु की ही प्रतीति होती है। जैसा कि कहा
भी गया है-
“इसका साक्षात्स्वरूप आकाश के समान है, जो हमेशा परमसूक्ष्म
परात्पर सदैव एक जैसा प्रतीत होने वाला, अजन्मा, अविनाशी, अद्वितीय,
निर्लिप्त, सर्वव्यापक अद्वितीय एवं विनिर्मुक्त ओ३म् है, वही मैं हूँ।”
किन्तु ज्ञाता एवं ज्ञेय के भेद का लोप होकर मात्र अद्वैतवस्तु ब्रह्म में
तदाकार से आकारित चित्तवृत्ति का अत्यधिक एकीभाव से स्थित होना