वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in contextसमाधि-निरूपण २६५
(ख) मनन- पूर्वप्रतिपादित छः प्रकार के लिङ्गों के तात्पर्य को
भलीप्रकार समझने के पश्चात् वेदान्त में प्रतिपादित अनुकूलयुक्तियों के
माध्यम से अद्वितीयतत्त्व ब्रह्म का निरन्तर चिन्तन करना ही 'मनन' कहलाता
है।
(ग) निदिध्यासन-शरीर से लेकर बुद्धिपर्यन्त भिन्न-भिन्न सभी जड़
पदार्थों में भिन्नता की भावना का परित्याग करके, सभी को एकमात्र ब्रह्म
मानकर, विश्वास करना ही निदिध्यासन कहा गया है।
विशेष-(1) उपर्युक्त दो गद्यखण्डों के अभिप्राय को संक्षेप में इसप्रकार
प्रस्तुत कर सकते हैं-
चित्र-५७
ब्रह्म का साक्षात्कार होने तक अपेक्षित अनुष्ठान
श्रवण मनन निदिध्यासन समाधि
सविकल्पक निर्विकल्पक
षड्लिङ्ग युक्त षड्लिङ्गयुक्त एकमात्र ब्रह्म
वेदान्तवाक्यों का वेदान्त वाक्यों को में विश्वास
अद्वितीय वस्तु समझकर निरन्तर (विस्तृत विवरण अग्रिम
में तात्पर्य ब्रह्मचिन्तन खण्ड में)
षड्लिङ्ग
उपक्रम-उपसंहार अभ्यास अपूर्वता फल अर्थवाद उपपत्ति
आदि और बीच-बीच में अन्य प्रमाण उस प्रसंग में स्थान-स्थान सिद्धि हेतु
अन्त में भली बार-बार द्वारा प्रमाणित श्रूयमान पर प्रशंसा युक्ति की
भांति प्रतिपादन उपपादन न होना प्रयोजन प्रस्तुति
ब्रह्म का
अवतरणिका-प्रसङ्ग-प्राप्त समाधि का साङ्गोपाङ्ग विस्तृत विवरण प्रस्तुत
करते हैं-
समाधिर्द्विविधः सविकल्पको निर्विकल्पक श्चेति। तत्र सविकल्पको
नाम ज्ञातृज्ञानादिविकल्पलयानपेक्षयाद्वितीयवस्तुनि तदाकारा-
कारितायाश्चित्तवृत्तेरवस्थानम्। तदा मृन्मयगजादिभानेऽपि मृद्भानवद्
द्वैतभानेऽप्यद्वैतं वस्तु भासते। तदुक्तम्-
“दृशिस्वरूपं गगनोपमं परं सकृद्विभातं त्वजमेकमक्षरम्।