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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 278 of 314

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Page 278

२६४ वेदान्तसार
'चन्द्रिका'-(4) फल-प्रकरण में प्रतिपादित करने योग्य आत्मज्ञान
अथवा उसके अनुष्ठान का उस प्रसंग में श्रूयमाण प्रयोजन ही फल है।
जैसे-वही (छान्दोग्योपनिषद् में) आचार्यवान् पुरुष ही जानता है, उसके
लिए तब तक ही विलम्ब समझना चाहिए जब तक वह इस शरीर से मुक्त
नहीं होता है, बाद में वह ब्रह्म ही हो जाता है; इसप्रकार उस अद्वितीय वस्तु
के ज्ञान का प्रयोजनरूप फल अद्वितीयवस्तु की प्राप्ति कहा गया है।
(५) अर्थवाद-प्रकरण में प्रतिपादन करने योग्य अद्वितीयवस्तु परब्रह्म
की जहाँ-तहाँ अवसर प्राप्त होने पर की गई प्रशंसा को अर्थवाद कहा गया
है। जिसप्रकार वहीं छान्दोग्योपनिषद् में ही-'सम्पूर्ण चराचरप्रपञ्च के
अधिष्ठाता उस परब्रह्म के स्वरूप के विषय में तूने पूछा है, जिसके बारे
में सुनने से अज्ञानी ज्ञानवान्, चिन्तन न किया हुआ चिन्तनशील तथा अज्ञात
वस्तु भी ज्ञात हो जाती है।' इसप्रकार अद्वितीयवस्तु परब्रह्म की प्रशंसा की
गई है। जो वस्तुतः अर्थवाद ही है।
(६) उपपत्ति-प्रकरण में प्रतिपादनयोग्य अद्वितीयवस्तु परब्रह्म को
प्रमाणित सिद्ध करने के लिए यत्र-तत्र जो तर्क एवं युक्तियाँ प्रस्तुत की
जाती हैं। उसे ही यहाँ उपपत्ति कहा गया है। जैसाकि वहीं छान्दोग्योपनिषद्
में-इस सम्पूर्ण चराचरजगत् को ब्रह्म का विवर्त सिद्ध करने के लिए
उपनिषद्कार ने प्रमाता को समझाते हुए युक्ति प्रस्तुत की है कि जिसप्रकार
एक ही मिट्टी के पिण्ड द्वारा बनी हुई वस्तुएँ, घट, दीपक, शकोरा आदि
सभी मूलतः मिट्टीरूप ही हैं। उनके नाम ही अलग-अलग हैं। तात्त्विकदृष्टि
से उनमें कोई भेद नहीं है। उनके नामों का परित्याग करने पर एकमात्र
मिट्टी ही शेष रह जाता है और वही सत्य भी है।
ठीक उसीप्रकार यह सम्पूर्णदृश्यमान नामरूपात्मक चराचरजगत् एकमात्र
ब्रह्म का ही विवर्त है। नदी, पर्वत, पशु, पक्षी, मनुष्य आदि दिखायी देने
वाला भेद नाममात्र का ही है। इसप्रकार ब्रह्ममात्र ही सत्य है जिसे-ब्रह्मसत्यं
जगन्मिथ्या आदि श्रुतिवचनों द्वारा कहा भी गया है। इसीलिए प्रलयकाल के
अन्त में भी एकमात्र वही तत्त्व शेष रहता है, इत्यादि वचन अद्वितीयवस्तु
ब्रह्म की सिद्धि हेतु तर्करूप में प्रस्तुत करना ही उपपत्ति है।
यहाँ तक ग्रन्थकार ने छः अंगों सहित 'श्रवण' का विस्तारपूर्वक उल्लेख
किया, तदनन्तर मनन का कथन करते हैं-