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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 277 of 314

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Page 277

अनुभववाक्यार्थ-निरूपण २६३
प्रकरणप्रतिपाद्यस्य तत्र तत्र प्रशंसनम् अर्थवादः। यथा-तत्र एव "उत तम
आदेशम् अप्राक्ष्यः येन अश्रुतम् श्रुतम् भवति, अमतम् मतम्, अविज्ञातम्
विज्ञातम्" इति अद्वितीयवस्तु प्रशंसनम्।
प्रकरणप्रतिपाद्य-अर्थसाधने तत्र तत्र श्रूयमाणा युक्तिः उपपत्तिः।
यथा-तत्र "यथा सौम्य, एकेन मृत्पिण्डेन सर्वम् मृण्मयम् विज्ञातम् स्याद्,
वाचा-आरम्भणम् विकारः नामधेयम् मृत्तिका इति एव सत्यम्" इत्यादौ
अद्वितीयवस्तुसाधने विकारस्य वाचा-आरम्भण-मात्रत्वे युक्तिः श्रूयते।
मननम् तु श्रुतस्य अद्वितीयवस्तुनः वेदान्तः-अनुगुणयुक्तिभिः अनवरतम्
अनुचिन्तनम्। विजातीय-देहादि-प्रत्ययरहित-अद्वितीयवस्तुसजातीयप्रत्यय-
प्रवाहः निदिध्यासनम्।।
अनुवाद-प्रकरण में प्रतिपादित करने योग्य विषय आत्मज्ञान अथवा
उसके अनुष्ठान का उस-उस विषय में सुनायी देता हुआ प्रयोजन ही फल
है। जैसाकि-"वहाँ आचार्यवान् पुरुष ही जानता है, उसके लिए तभी तक
विलम्ब समझना चाहिए जब तक वह इससे मुक्त नहीं हो जाता है, इसके
बाद वह ब्रह्म ही हो जाता है।" इत्यादि (वाक्यों में) अद्वितीय वस्तु के
ज्ञान एवं उसकी प्राप्ति का प्रयोजन बताया गया है।
प्रकरण में प्रतिपाद्य वस्तु की यत्र तत्र प्रशंसा करना ही अर्थवाद है।
जैसे-"वहीं तूने (ब्रह्म) के उस उपदेश को पूछा है जिसके द्वारा न सुना
गया सुना हुआ, अचिन्तित चिन्तन किया हुआ और अविज्ञात भलीप्रकार
जाना हुआ हो जाता है", इसप्रकार अद्वितीयवस्तु ब्रह्म की प्रशंसा की गई है।
प्रकरण में प्रतिपादित करने योग्य वस्तु को सिद्ध करने के लिए यत्र तत्र
वर्णन की गई युक्तियाँ ही उपपत्ति है। जैसे-वहीं 'हे सौम्य! जिसप्रकार एक
ही मिट्टी के पिण्ड से बनी हुई सभी मिट्टी की वस्तुओं का ज्ञान हो जाता
है। उसके विभिन्न विकार केवल शब्दप्रपञ्चमात्र हैं, मिट्टी ही वहाँ वस्तुतः
सत्य है।' इत्यादि में अद्वितीयवस्तु की सिद्धि में (जगत् प्रपञ्चरूप) कार्य
को वाणी का प्रपञ्चमात्र कहना रूप युक्ति सुनाई देती है।
केवल वेदान्त के अनुकूल युक्तियों द्वारा सुनी गई अद्वैतवस्तुरूप (ब्रह्म)
का निरन्तर बार-बार चिन्तन ही मनन है। विजातीयदेह आदि के विचारों से
रहित अद्वितीयवस्तु के बारे में अनुकूल विचारधारा के प्रवाह को निदिध्यासन
कहा गया है।