Skip to content
SarvaKosh
वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 136 of 314

Read in context
Page 136

१२२ वेदान्तसार
नैमित्तिकप्रायश्चित्तोपासनानुष्ठानेन निर्गतनिखिलकल्मषतया नितान्त-
निर्मलस्वान्तः साधनचतुष्टयसम्पन्नः प्रमाता।
पदच्छेद-अधिकारी तु विधिवत्-अधीन-वेद-वेदाङ्गत्वेन आपाततः
अधिगत अखिल वेदार्थः, अस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा, काम्य-निषिद्ध-वर्जन
पुरःसरम्, नित्य-नैमित्तिक- प्रायश्चित्त-उपासना-अनुष्ठानेन, निर्गत-निखिल
कल्मषतया, नितान्त-निर्मल-स्व-अन्तः, साधन-चतुष्टय-सम्पन्नः प्रमाता।
अनुवाद- अधिकारी तो वस्तुतः (वह) जिज्ञासु (प्रमाता) है, जिसने
वेद-वेदाङ्गों का विधिपूर्वक अध्ययन करके सम्पूर्णवेदों के अभिप्राय को
भलीप्रकार जान लिया है। इस जन्म में अथवा पूर्वजन्म में, कामनाओं को
पूर्ण करने वाले काम्यकर्म तथा शास्त्रों द्वारा निषेध किए गए कर्मों को
छोड़ने के साथ-साथ, नित्य, नैमित्तिक, प्रायश्चित्त और उपासनाकर्मों के
अनुष्ठान से, सम्पूर्णपापों (कल्मषता) से मुक्त, अत्यधिक निर्मल अन्तःकरण
वाला होकर साधन-चतुष्टय को अपना लिया है।
'चन्द्रिका'- वस्तुतः वेदान्तशास्त्र का अध्ययन करने का अधिकारी
केवल वही जिज्ञासु व्यक्ति हो सकता है जिसने ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेदादि
संहिता ग्रन्थों तथा इनके ब्राह्मण, आरण्यक एवं उपनिषदों का गहन अध्ययन
करने के साथ-साथ, शिक्षा, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छन्द एवं ज्योतिष इन
छः वेदाङ्गों का गुरुमुख से विधिवत् ज्ञान प्राप्त किया हो। परिणामस्वरूप
वेदों में प्रतिपादित अभिप्राय को हृदयंगम कर लिया हो। इसप्रकार वेदों का
विस्तृत एवं गहन अध्ययन सम्भव है, व्यक्ति एक जन्म में पूर्णरूप से न
कर सके अथवा अधिकारी बनने की योग्यता के लिए यदि व्यक्ति के लिए
एक जन्म पर्याप्त न हो तो यह कार्य वह अनेकजन्मों में भी निष्पादित कर
सकता है।
इसी अभिप्राय को व्यक्त करते हुए ग्रन्थकार कहते हैं कि इस वर्तमान
जन्म में अथवा पूर्व जन्मों में जिस साधक ने अपनी इच्छाओं को पूर्ण करने
के साधनस्वरूप जितने भी काम्यकर्म हैं तथा हमारे प्राचीन ऋषि-मुनि एवं
आचार्यों द्वारा लिखे गए शास्त्रों में जिन कर्मों का निषेध किया गया है
अर्थात् जिन्हें करने से पाप अथवा नरक की प्राप्ति होती है, ब्रह्महत्या आदि
ऐसे निषिद्धकर्मों का भी जिसने परित्याग कर दिया हो, ऐसा प्रमाता ही
वेदान्तशास्त्र के अध्ययन का अधिकारी हो सकता है।
ग्रन्थकार ने यहाँ तक प्रमाता के लिए दो बातों पर अधिक जोर दिया
प्रथम, वेद-वेदाङ्गों का गुरुमुख से विधिपूर्वक गहन अध्ययन, द्वितीय, काम्य