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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 137 of 314

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Page 137

अनुबन्ध चतुष्टय १२३

एवं निषिद्धकर्मों का परित्याग। तत्पश्चात् उसके द्वारा किए जाने वाले उन
कर्मों का उल्लेख करते हैं जिनके करने से उस जिज्ञासु का अन्तःकरण
पूर्णतया पापरहित होकर नितान्तनिर्मल हो जाता है। इस क्रम में नित्य,
नैमित्तिक, प्रायश्चित्त और उपासन चार कर्मों के करने का प्रावधान किया
गया है।
(१) नित्यकर्म- वे कहलाते हैं जिनके करने से विशेष पुण्य की
प्राप्ति न हो, किन्तु न करने से हानि अवश्य होती हो। जैसे-दन्तधावन्,
स्नान करने या घर में झाडू लगाने से कोई विशेष पुण्य नहीं होता है, किन्तु
इनके न करने से घर में कूड़ा बढ़ने, शरीर पर मैल की वृद्धि होने से
स्वास्थ्य विषयक हानि अवश्य होती है। इसीप्रकार व्यक्ति दिनभर
जाने-अन्जाने अनेक पापकर्म करता है, वे एकत्रित होकर हानिकर न हों,
इसके लिए किए गए सन्ध्यावन्दन आदि कर्म भी नित्यकर्मों की श्रेणी में ही
परिगणित हैं।
(२) किसी निमित्तविशेष को मानकर किए गए कर्म नैमित्तिक कहलाते
हैं। जैसे-पुत्र आदि के उत्पन्न होने पर किए गए जातेष्टियज्ञ अथवा ग्रहण
आदि के अवसर पर किया गया स्नान, नैमित्तिककर्म की कोटि में आता है।
(३) जाने अन्जाने किए गए पापों के प्रक्षालन के लिए प्रायश्चित्त
स्वरूप किए गए कर्म चान्द्रायण व्रतादि प्रायश्चित्त कर्मों की श्रेणी में माने
गए हैं। शास्त्रों की ऐसी मान्यता है कि इन कर्मों को करने से व्यक्ति
पापमुक्त हो जाता है।
(४) सम्पूर्ण चराचरजगत् को उस परमब्रह्म परमात्मा का स्वरूप मानकर
चित्त की एकाग्रता के लिए अत्यन्त आदरभाव से जो प्रयास किए जाते हैं,
उन्हें दार्शनिकभाषा में उपासनकर्म कहते हैं। इस क्रम में साधक वस्तुतः
अपने आराध्यदेव का सगुणरूप में चिन्तन करते हुए इधर-उधर भटकते हुए
अपने मन को एक स्थान पर लगाता है। छान्दोग्योपनिषद् में आचार्य
शाण्डिल्य ने इस विद्या का विस्तारपूर्वक उल्लेख किया है। इसीकारण इस
विद्या को उनके नाम से “शाण्डिल्य-विद्या" के रूप में जाना जाता है।
नित्य, नैमित्तिक एवं प्रायश्चित्तकर्मों द्वारा साधक की बुद्धि की शुद्धि
होती है तथा उपासनकर्मों से चित्त की एकाग्रता में वृद्धि होती है। इसलिए
साधक को अनिवार्यरूप से इन कर्मों को करना चाहिए, तभी वह इस शास्त्र
के अध्ययन का अधिकारी होता है। यद्यपि नित्य, नैमित्तिक एवं उपासन-
कर्मों द्वारा पितृलोक तथा सत्यलोकादि की प्राप्ति भी होती है तथापि इनका