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वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)

Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary

by सदानन्द योगीन्द्र

Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)

DevanagariSanskritpublished314 pages

Page 135 of 314

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Page 135

अनुबन्ध चतुष्टय १२१
(6) प्रस्तुतखण्ड के तृतीय अंश में प्रयुक्त 'न ते पृथक् आलोचनीयाः'
का अभिप्राय 'उन्हें अलग नहीं समझना चाहिए' करना उचित है, किन्तु
कुछ विद्वानो ने 'उनकी अलग से व्याख्या उचित नहीं है' ऐसा अर्थ भी
किया है।
(7) प्रस्तुत अंश के अन्तिमचरण में प्रयुक्त 'तत्र' पद के व्याख्याकारों
में विद्वन्मनोरञ्जिनीकार ने इसका वेदान्तशास्त्र अर्थ किया है, जबकि कुछ
अन्य विद्वान् इसे 'अनुबन्ध के सम्बन्ध में' प्रयुक्त मानते हैं।
(8) यहाँ प्रयुक्त 'नाम' पद 'वस्तुतः' अर्थ की अभिव्यक्ति के लिए
प्रयुक्त हुआ है।
(9) उपर्युक्त खण्ड के अभिप्राय को हम इसप्रकार भी प्रदर्शित कर
सकते हैं-
चित्र-२०
[वेदान्तशास्त्र]
[उपनिषद्] → [अनुबन्ध चतुष्टय] ← [ब्रह्मसूत्र (शारीरकसूत्र / श्रीमद्भगवद्गीता]
[प्रमाण स्वरूप] ← [अनुबन्ध चतुष्टय] → [उपकारक/व्याख्या ग्रन्थ]
[अधिकारी] [विषय] [सम्बन्ध] [प्रोजन]
↑
(अनुबन्ध चतुष्टय) ← [वेदान्तप्रकरणत्वात् तदीयैः एव अनुबन्धैः तद्वत्ता सिद्धेः न ते पृथक् आलोचनीयाः।]
वेदान्तसार
[प्रकरण ग्रन्थ]
अवतरणिका-वेदान्तसार एवं वेदान्तशास्त्र के अनुबन्ध-चतुष्टय के ऐक्य
प्रतिपादनपूर्वक आचार्य सदानन्द, अधिकारी, विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन
इस अनुबन्ध का नाम संकीर्तन करने के बाद प्रस्तुतखण्ड में प्रथम अनुबन्ध
अधिकारी की विस्तृत व्याख्या प्रस्तुत करते हुए कहते हैं-
अधिकारी तु विधिवदधीतवेदवेदाङ्गत्वेनापाततोऽधिगताखिल-
वेदार्थोऽस्मिन् जन्मनि जन्मान्तरे वा काम्यनिषिद्धवर्जनपुरःसरं नित्य-