वेदान्तसार (सदानन्द योगीन्द्र - विद्वन्मनोरञ्जनी व हिन्दी व्याख्या सहित)
Vedantasara of Sadananda with Hindi Commentary
by सदानन्द योगीन्द्र
Source: चौखम्बा संस्कृत संस्थान · चौखम्बा संस्कृत संस्थान (origin)
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Read in context१२० वेदान्तसार
सम्बन्ध है अर्थात् क्या इस पुस्तक के नामकरण तथा इसमें प्रतिपादित
विषय में कोई सीधा सम्बन्ध है? (घ) इस ग्रन्थ का अध्ययन करने से क्या
मुझे कोई लाभ होगा? कहीं इस पुस्तक के अध्ययन से मेरा समय और
शक्ति व्यर्थ तो नहीं होंगे?
इन चार बातों को ध्यान में रख़कर ही कोई भी व्यक्ति किसी ग्रन्थ के
अध्ययन में प्रवृत्त होता है। मनोनुकूलता होने पर ही वह ग्रन्थ को प्रारम्भ से
अन्त तक रुचिपूर्वक पढ़ता है, उस पर चिन्तन करता है। इसीलिए कोई भी
ग्रन्थकार ग्रन्थ के प्रारम्भ में इन चारों बातों का उल्लेख अवश्य करता है।
इसीको शास्त्रीयभाषा में अनुबन्ध-चतुष्टय कहा जाता है। इसी बात को
विद्वानों ने इसप्रकार प्रतिपादित किया है-
ज्ञातार्थं ज्ञातसम्बन्धं श्रोतुं श्रोता प्रवर्तते।
ग्रन्थादौ तेन वक्तव्यः सम्बन्धः सप्रयोजनः।। (वाचस्पत्यम्)
वेदान्तदर्शन के मुख्यग्रन्थ ब्रह्मसूत्र आदि में अनुबन्धचतुष्टय का
विस्तारपूर्वक उल्लेख किया गया है तथा प्रस्तुत 'वेदान्तसार' वेदान्तदर्शन का
ही एक प्रकरणग्रन्थ है। इसलिए इनकी आपस में अनुबन्धवत्ता स्वतः सिद्ध
होती है अर्थात् ब्रह्मसूत्र एवं वेदान्तसार के अनुबन्धचतुष्टय में लेशमात्र भी
भेद नहीं है। ब्रह्मसूत्र के अनुबन्ध वेदान्तसार पर भी लागू होते हैं। अतः
इनको पृथक्-पृथक् मानने का औचित्य नहीं है।
प्रस्तुतखण्ड के अन्तिम अंश में ग्रन्थकार अनुबन्धचतुष्टय का अधिकारी,
विषय, सम्बन्ध और प्रयोजन के रूप में नामोल्लेख करके, अग्रिम खण्ड में
उसे स्पष्ट करते हैं। जिसका विस्तृत विवेचन हम अग्रिम खण्ड की व्याख्या
करते समय ही करेंगे।
विशेष- (1) 'वेदान्त' शब्द वेदान्तदर्शन के लिए प्रयुक्त हुआ है।
(2) 'उपकारक' से अभिप्राय व्याख्या करने वाले ग्रन्थों से ग्रहण करना
चाहिए।
(3) ब्रह्मसूत्र वेदान्तदर्शन का उत्कृष्टग्रन्थ माना गया है जिसकी संरचना
महर्षि व्यास ने की। इसी का अन्य नाम 'शारीरकसूत्र' भी है।
(4) वेदान्तसार की रचना आचार्य सदानन्द ने गद्यखण्डों के रूप में की
है। सम्पूर्णग्रन्थ में कुल 37 गद्यखण्डों का प्रयोग हुआ है।
(5) अपने कथन की पुष्टि में ग्रन्थकार ने पदे-पदे श्रुतिवचनों
(उपनिषद्वाक्यों) को प्रमाणरूप में प्रस्तुत किया है। प्राचीनसमय में विषय
प्रतिपादन की यही शैली रही है।