वराह पुराण
Varaha Purana
by महर्षि वेदव्यास
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Read in context| १३४ | संक्षिप्त श्रीवराहपुराण | [ अध्याय ७५ |
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प्रकार इन प्रजाओंकी निरन्तर वृद्धि होती गयी। उनसे सात द्वीपोंवाली यह पृथ्वी तथा भारतवर्ष सर्वथा व्याप्त हो गया। उनके वंशमें उत्पन्न हुए राजाओंसे यह भूमण्डल पालित होता आया है। सत्ययुग, त्रेता आदि युगों एवं महायुगोंसे परिपूर्ण एकहत्तर चतुर्युगका एक मन्वन्तर कहा जाता है। भुवनके प्रसङ्गमें मैंने यह स्वायम्भुवमन्वन्तरकी बात कही। [अध्याय ७४]
जम्बूद्वीपसे सम्बन्धित सुमेरुपर्वतका वर्णन
भगवान् रुद्र कहते हैं— विप्रवर! अब मैं जम्बूद्वीपका यथार्थ वर्णन करूँगा। साथ ही समुद्रों और द्वीपोंकी संख्या एवं विस्तारका भी वर्णन करूँगा। उन सब द्वीपोंमें जितने वर्ष और नदियाँ हैं, उनका तथा पृथ्वी आदिके विस्तारका प्रमाण, सूर्य एवं चन्द्रमाकी पृथक् गतियाँ, सातों द्वीपोंके भीतर वर्तमान हजारों छोटे द्वीपोंके नाम-रूपका वर्णन, जिनसे यह जगत् व्याप्त है, उनकी पूरी संख्या बतानेके लिये तो कोई भी समर्थ नहीं है। फिर भी मैं सूर्य और चन्द्रमा आदि ग्रहोंके साथ उन सात द्वीपोंका वर्णन करूँगा, जिनके प्रमाणोंको मनुष्य तर्कद्वारा प्रतिपादन करते हैं। वस्तुतः जो भाव सर्वथा अचिन्त्य हैं, उनको तर्कसे सिद्ध करनेकी चेष्टा नहीं करनी चाहिये। जो वस्तु प्रकृतिसे परे है, वही अचिन्त्यका लक्षण है—उसे अचिन्त्य-स्वरूप समझना चाहिये। अब मैं जम्बू-द्वीपके नौ वर्षोंका तथा अनेक योजनोंमें फैले हुए उसके मण्डलोंका यथार्थ वर्णन करता हूँ, तुम उसे सुनो। चारों तरफ फैला हुआ यह जम्बूद्वीप लाख योजनोंका है। अनेक योजनवाले पवित्र बहुत-से जनपद इसकी शोभा बढ़ाते हैं। यह सिद्ध और चारणोंसे व्याप्त है तथा पर्वतोंसे इसकी शोभा अत्यन्त मनोहर जान पड़ती है। अनेक प्रकारकी सुन्दर धातुएँ इसका गौरव बढ़ा रही हैं। शिलाजीत आदिके उत्पन्न होनेसे इसकी महिमा चरम सीमापर पहुँच गयी है। पर्वतीय नदियोंसे चारों तरफ यह चमचमा रहा है। ऐसे विस्तृत एवं श्रीसम्पन्न भूमण्डलवाले जम्बूद्वीपमें नौ वर्ष चारों ओर व्याप्त हैं। यह ऐसा सुन्दर द्वीप है, जहाँ सम्पूर्ण प्राणियोंको प्रकट करनेवाले भगवान् श्रीनारायण विराजते हैं। इसके विस्तारके अनुसार चारों ओर समुद्र हैं तथा पूर्वमें उतने ही लम्बे-चौड़े ये छः वर्ष पर्वत हैं। इसके पूर्व और पश्चिम—दो तरफ लवणसमुद्र हैं। वहाँ बर्फसे व्याप्त हुआ हिमालय, सुवर्णसे भरा हेमकूट तथा अत्यन्त सुख देनेवाला महान् निषध नामक पर्वत है। चार वर्णवाले सुवर्णयुक्त सुमेरु-पर्वतका वर्णन तो मैं पहले ही कर चुका हूँ, जो कमलके समान वर्तुलाकार है। उसके चारों भाग बराबर हैं और वह बहुत ऊँचा है। उसके पार्श्व भागोंमें परमब्रह्म परमात्माकी नाभिसे प्रकट हुए तथा प्रजापति नामसे प्रसिद्ध एवं गुणवान् ब्रह्माजी विराजते हैं। इस जम्बूद्वीपके पूर्व भागमें श्वेतवर्ण-वाले प्राणी हैं, जो ब्राह्मण हैं। जो दक्षिणकी ओर पीतवर्ण हैं, उन्हें वैश्य माना जाता है। जो पश्चिमकी ओर भृङ्गराजके पत्रकी आभावाले हैं, उनको शूद्र कहा गया है। इस सुमेरुपर्वतके उत्तर भागमें संचय करनेके इच्छुक जो प्राणी हैं तथा जिनका वर्ण लाल है, उन्हें क्षत्रियकी संज्ञा प्राप्त हुई है। इस प्रकार वर्णोंकी बात कही जाती है। स्वभाव, वर्ण और परिमाणसे इसकी गोलाईका वर्णन हुआ है। इसका शिखर नीलम एवं वैदूर्य मणिके समान है। वह कहीं श्वेत, कहीं शुक्ल और कहीं पीले रंगका है। कहीं वह धतूरेके रंगके समान हरा है और कहीं मोरके पंखकी भाँति चितकबरा। इन