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वराह पुराण

वराह पुराण

Varaha Purana

by महर्षि वेदव्यास

DevanagariHindipublished414 pages

Page 146 of 414

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Page 146

अध्याय ७५ ] जम्बूद्वीपसे सम्बन्धित सुमेरुपर्वतका वर्णन [ १३५

सभी पर्वतोंपर सिद्ध और चारणगण निवास करते हैं। इन पर्वतोंके बीचमें नौ हजार लम्बा-चौड़ा 'विष्कम्भ' नामका पर्वत कहा जाता है। इस महान् सुमेरुपर्वतके मध्य भागमें इलावृत वर्ष है। इसीसे उसका विस्तार चारों ओर फैला हुआ हजार योजन माना जाता है। उसके मध्यमें धूम्ररहित आगकी भाँति प्रकाशमान महामेरु है। सुमेरुकी वेदीके दक्षिणका आधा भाग और उत्तरका आधा भाग उसका (महामेरुका) स्थान माना जाता है। वहाँ जो ये छः वर्ष हैं, उनकी वर्ष-पर्वतकी संज्ञा है। इन सभी वर्षोंके आगे एक योजनका अवकाश है। वर्षोंकी लम्बाई-चौड़ाई—दो-दो हजार योजनकी है। उन्हींके परिमाणसे जम्बूद्वीपका विस्तार कहा जाता है। एक-एक लाख योजन विस्तारवाले नील और निषध नामके दो पर्वत हैं। उनके अतिरिक्त श्वेत, हेमकूट, हिमवान् और शृङ्गवान् नामक पर्वत हैं। जम्बूद्वीपके प्रमाणसे निषधपर्वतका वर्णन किया गया है। हेमकूट निषधसे हीन है, वह उसके बारहवें भागके ही तुल्य है। वह हिमवान् पर्वत पूर्वसे पश्चिमतक फैला हुआ है। द्वीपके मण्डलाकार होनेसे कहीं कम और कहीं अधिक हो जानेकी बात कही जाती है। वर्षों और पर्वतोंके प्रमाण जैसे दक्षिणके कहे जाते हैं, वैसे ही उत्तरमें भी हैं। उनके मध्यमें जो मनुष्योंकी बस्तियाँ हैं, उनके नाम अनुवर्ष हैं। वे वर्ष विषम स्थानवाले पर्वतोंसे घिरे हुए हैं। उन अगम्य वर्षोंको अनेक प्रकारकी नदियोंने घेर रखा है। उन वर्षोंमें विभिन्न जातिवाले प्राणी निवास करते हैं। ये हिमालय-सम्बन्धी वर्ष हैं, जहाँ भरतकी संतान सुशोभित होती है।

हेमकूटपर जो उत्तम वर्ष है, उसे किम्पुरुष कहते हैं। हेमकूटसे आगेके वर्षका नाम निषध और हरिवर्ष है। हरिवर्षसे आगे और हेमकूटके पासके भू-भागको इलावृतवर्ष कहा जाता है। इलावृतके आगेके वर्षोंका नाम नील और रम्यक सुना गया है। रम्यकसे आगे श्वेतवर्ष और हिरण्यमयवर्षोंकी प्रतिष्ठा है। हिरण्यमयवर्षसे आगे शृङ्गवन्त और कुरुवर्षोंका अवस्थान है। ये दोनों वर्ष धनुषाकार दक्षिण और उत्तरतक झुके हैं—ऐसा जानना चाहिये। इलावृतके चारों कोने बराबर हैं। यह प्रायः द्वीपके चतुर्थांश भागमें है। निषधकी वेदीके आधे भागको उत्तर कहा गया है। इनके दक्षिण और उत्तर दिशाओंमें तीन-तीन वर्ष हैं। उन दोनों भागोंके मध्यमें मेरुपर्वत है। उसीको इलावृतवर्ष जानना चाहिये। प्रमाणमें वह चौंतीस हजार योजन बताया गया है। उसके पश्चिम गन्धमादन नामका प्रसिद्ध पर्वत है। ऊँचाई और लम्बाई-चौड़ाईमें प्रायः माल्यवान् पर्वतसे उसकी तुलना होती है। उक्त निषध और गन्धमादन—इन दोनों पर्वतोंके मध्यभागमें सुवर्णमय मेरुपर्वत है। सुमेरुके चारों भागोंमें समुद्रकी खानें हैं। इसके चारों कोण समान स्थितिमें हैं। वहाँ सभी धातुओंकी मेद एवं हड्डियाँ उनके अवतार लेनेमें सहयोगी नहीं हैं। छः प्रकारके योगैश्वर्योंके कारण वे विभु कहलाते हैं। सनातन कमलकी उत्पत्तिका निमित्तकारण वे ही हैं। उस कमलपर स्थित चतुर्मुख ब्रह्मा भी उन परब्रह्म परमात्माके ही रूप हैं, कोई अन्य शक्ति नहीं। कमलकी आकृति धारण करनेवाली तथा वनों एवं हृदोंसे सम्पन्न पृथ्वी इन्हीं परब्रह्म परमात्मासे उत्पन्न हुई है।

जिसपर संसार स्थान पाता है, उस कमलके विस्तारका स्पष्ट रूपसे मैंने वर्णन किया। द्विजवरो! अब क्रमशः विभाग करके उनके विशेष गुणोंका वर्णन करता हूँ, सुनो। सुमेरुपर्वतके