वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya
by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद
Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)
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Read in context५३२ न्याय कन्दली संवलित प्रशस्तपाद भाष्यम् [ गुणेऽनुमाने उपमानान्तर्भाव-
न्यायकन्दली
प्रत्येकं परिसमाप्तत्वेऽपि सादृश्यं यद्यपि गवयग्रहणाभावाद् गवयसदृश इति गवि पूर्वं
प्रतीतिर्नासीत्, तथापि । स्वाश्रयसन्निकर्षमात्रभाविनो सादृश्यप्रतीतिरुचितेव । यथा
प्रतियोग्यन्तराग्रहणात् तस्मादिदं दीर्घमिदं ह्रस्वमिति प्रतीत्यभावेऽपि स्वाश्रयप्रत्यासत्तिमात्रेण
परिमाणस्य स्वरूपतो ग्रहणम् । कथममन्यथा देशान्तरगतः प्रतियोगिनं गृहीत्वा अस्मात्
तद्दीर्घं ह्रस्वमिति व्यवस्यति ।
यदि गवि पुरा सादृश्यमिन्द्रियापातमात्रेण न गृहीतम् ? सम्प्र-
त्यपि गवये न गृह्यते, गवयदर्शनादेव गवये च स्मरणमित्युभयनियमो न
स्याद्विशेषात् । यावतां खुरलाङ्गूलादिसामान्यानां गवि ग्रहणम्, तावतामेव
गवयेऽपि ग्रहणात् स्मरणनियम इति चेत् ? भूयोऽवयवसामान्यन्येवोभयवृत्तित्वात्
सादृश्यम् । तानि चेत् प्रत्येकमाश्रयग्रहणेन गृह्यन्ते, गृहीतमेव सादृश्यम् । तस्माद्
यद्यपि सादृश्य अपने प्रत्येक आश्रय में स्वतन्त्र रूप से ही रहता है, फिर भी
यह तो मानना ही पड़ेगा कि गवय को देखने से पहले उसका ज्ञान न रहने के
कारण (गो प्रत्यक्ष के समय) गो में 'यह गवय के समान है' इस आकार की
प्रतीति नहीं थी, तथापि केवल सादृश्य के आश्रयीभूत गवय में चक्षु के सन्निकर्ष
से, (फलतः ज्ञानलक्षण सन्निकर्ष से सादृश्य का प्रत्यक्ष सम्भव न होने पर भी
स्वसंयुक्तसमवाय सम्बन्ध से ही) सादृश्य का ग्रहण होना अनुचित नहीं है । जैसे
कि दीर्घादि के आश्रयीभूत दण्डादि आश्रय जहाँ प्रत्यक्ष के द्वारा गृहीत रहते हैं,
एवं इन दीर्घादि परिमाणों के दूसरे अवधि द्रव्यों का ज्ञान नहीं रहता है, ऐसे
स्थलों में 'यह इससे दीर्घ है' या 'यह इससे छोटा है,' इत्यादि विशिष्ट प्रतीतियाँ
यद्यपि नहीं होती हैं, फिर भी 'यह दीर्घ है' या 'यह ह्रस्व है' इत्यादि आकारों से
स्वरूपतः केवल परिमाण का ग्रहण तो होता ही है, यदि ऐसी बात न हो तो दूसरे
देश में जाकर वह उसके दूसरे अवधि रूप प्रतियोगी को जब देख लेता है, उसके
बाद 'यह उस द्रव्य से बड़ा या छोटा है' इस प्रकार की जो प्रतीति होती है, वह
कैसे होगी ?
(प्र.) गो में यदि गोत्व की तरह गवय का सादृश्य भी रहता तो गवय को
देखने से पहले भी गो में इन्द्रिय सम्बन्ध के होते ही गवय के सादृश्य
की भी प्रतीति हो जाती, सो नहीं होती है ? (उ.) गवय के प्रत्यक्ष के समय भी
तो गो में उस सादृश्य की प्रतीति नहीं होती है । अतः यह दोनों नियम नहीं
किये जा सकते कि उक्त सादृश्य की प्रतीति (१) गवय-प्रत्यक्ष से ही उत्पन्न
होती है और (२) गो में ही उत्पन्न होती है; क्योंकि इससे विपरीत कल्पना के लिए
भी स्थिति समान है। (प्र.) खुर, पूँछ प्रभृति जितने धर्मों का पहले गो में ग्रहण हो
चुका है, उतने का ही जब गवय में भी ग्रहण होता है तभी गो में गवयसादृश्य का
स्मरण होता है, ऐसे नियम की कल्पना करेंगे ।