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वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

वैशेषिक दर्शन (प्रशस्तपाद भाष्य सहित)

Vaisheshika Darshan with Prashastapada Bhashya

by महर्षि कणाद / महर्षि प्रशस्तपाद

Source: चौखम्बा संस्कृत सीरीज · चौखम्बा संस्कृत सीरीज · 1950 (origin)

DevanagariSanskritpublished759 pages

Page 496 of 759

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Page 496

प्रकरणम्] भाषाानुवादसहितम् ५३१
न्यायकन्दली
प्रतिपादनादुपमानं यथा गौर्गवयस्तथेति वाक्यमाप्तवचनमेव, वक्तृप्रामाण्यादेव तथा
प्रतीतेः। आप्तवचनं चानुमानम् । तस्मादुपमानमप्यनुमानाव्यतिरिक्तमित्यभिप्रायः ।
ये तावत् पूर्वमीमांसका वनेचरवचनमेवोपमानमाहुः, तेषामिदमनुमानमेव ।
येऽपि शबरस्वामिशिष्या अनुभूतस्य गोपिण्डस्य वने गवयदर्शनात् स्मृत्यारूढायां गवि
'मदीया गौरनेन सदृशी' इति सारूप्यज्ञानमुपमानमाचक्षते, तदपि स्मरणमेव । सादृश्यं हि
सामान्यवत् प्रत्येकं व्यक्तिसमाप्तं न संयोगवदुभयत्र व्यासज्य वर्तते, गोपिण्डस्यादर्शनेऽपि
वने गवयव्यक्तौ गोसदृशोऽयमिति प्रतीत्युत्पादात् । यथोक्तं मीमांसागुरुभिः -
सामान्यवच्च सादृश्यमेकैकत्र समाप्यते ।
प्रतियोगिन्यदृष्टेऽपि यस्मात् तदुपलभ्यते ॥ इति ।
लिए 'यथा गौस्तथा गवयः' (अर्थात् गो को जिस प्रकार देख रहे हो गवय भी
उसी प्रकार का होता है) प्रयुक्त यह वाक्य 'आप्तवचन' अर्थात् शब्द प्रमाण ही है;
क्योंकि यहाँ भी वचनों के प्रमाण्य से ही अर्थ की प्रतीति होती है । आप्तवचन
अनुमान से भिन्न कोई प्रमाण नहीं है । अतः उपमान भी अनुमान के ही अन्तर्गत
है, यही उक्त भाष्य सन्दर्भ का अभिप्राय है ।
प्राचीन मीमांसकों ने वनवासी के उक्त आप्तपुरुष के वचन को ही उपमान
प्रमाण माना है, उनका यह उपमान प्रमाण भी अनुमान में ही अन्तर्भूत हो जाता है ।
शबरस्वामी (मीमांसासूत्र के भाष्यकर्ता) के अनुयायी शिष्यगण यह कहते हैं
कि जिस पुरुष ने गाय के शरीर को देखा है, वन में जाने पर वही जब गवय को
देखता है, तब उसे पहले देखे हुए गो का स्मरण हो आता है । तब स्मरण किये
हुए उस गो में यह बुद्धि उत्पन्न होती है कि 'हमारी गाय इस गवय के समान है' ।
यह सादृश्य ज्ञान ही उपमान प्रमाण है । इस प्रकार का उपमान प्रमाण रूप ज्ञान
अनुमान के अन्तर्गत न आने पर भी स्मरण रूप हो सकता है; क्योंकि जिस
प्रकार सामान्य (जाति) की अधिकरणता उसके प्रत्येक अधिकरण में अलग-अलग
होती है, उसी प्रकार सादृश्य की अधिकरणता भी उसके अनुयोगी और प्रतियोगी
दोनों में अलग-अलग है । जिस प्रकार संयोग के अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में
उसकी एक ही अधिकरणता रहती है, उस प्रकार सादृश्य की एक ही
अधिकरणता उसके अनुयोगी और प्रतियोगी दोनों में नहीं है; किन्तु अलग-अलग
है । अतः गवय को देखने के समय गो का प्रत्यक्ष न रहने पर भी वन में गवय
व्यक्ति रूप सादृश्य का ज्ञान उस समय अप्रत्यक्ष गो में भी हो सकता है ।
जैसा कि मीमांसा के आचार्यों ने कहा है कि-चूँकि सादृश्य की उपलब्धि
उसके (एक आश्रय) प्रतियोगी के न देखने पर भी होती है, अतः सामान्य की
तरह उसकी आश्रयता प्रत्येक आश्रय में अलग-अलग है ।