वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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Read in contextनवमाऽध्याय २ आन्हिक १३७
३४२-तत्समवायात्कर्मगुणेषु ॥ १४ ॥
( तत्समवायात् ) [ जिन सूक्ष्मद्रव्यों का प्रत्यक्ष होता है ] उन के सम-
वायसम्बन्ध से ( कर्मगुणेषु ) [ उन २ द्रव्यों के ] कर्मों और गुणों में [ भी
प्रत्यक्ष हो जाता है ] ॥ १४ ॥
३४३-आत्मसमवायादात्मगुणेषु ॥ १५ ॥
( आत्मसमवायात् ) जीवात्मा के साथ समवाय सम्बन्ध से ( आत्म
गुणेषु ) आत्मा के [ चेतनत्वादि वा सुखदुःखादि ] गुणों का [ प्रत्यक्ष होजाता है ] ॥
केवल जीवात्मा का यद्यपि सुखदुःखादि से समवाय सम्बन्ध वा नित्य-
सम्बन्ध नहीं है, परन्तु मनसहित आत्मा के लिये यहां आत्मा शब्द का व्यव-
हार समझो, अथवा आत्मा के गुणों में सुखदुःखादि का ग्रहण न करके,
केवल चेतनता का ग्रहण करके बहुवचन को अविवक्षित जानो ॥ १५ ॥
उत्पत्ति से पूर्व कार्य का असत् होना, प्रत्यक्ष होना, और योगियों का
प्रत्यक्ष, इस आन्हिक में वर्णित किया गया ॥
इति नवमाऽध्यायस्य प्रथममान्हिकम् ॥ १ ॥
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अथ द्वितीयमान्हिकम्
प्रत्यक्ष की परीक्षा कह कर अब आगे लैङ्गज्ञान की परीक्षा का आरम्भ
करते हैं:-
३४४-अस्येदं कार्यं, कारणं, संयोगि, विरोधि,
समवायि, चेति लैङ्गिकम् ॥ १ ॥
( अस्य ) इस का ( इदम् ) यह ( कार्यं ) कार्य है, ( कारणम् ) कारण
है, ( संयोगि ) संयोगी है, ( विरोधि ) विरोधी है ( च ) और (समवायि)
सदा साथ मिलारहने वाला है ( इति ) इस को ( लैङ्गिकम् ) लिङ्गोत्पन्न
ज्ञान कहते हैं ॥
अर्थात् कार्य को देखकर कारण का, कारण को देखकर कार्य का, संयोग
को देखकर संयोगी का, विरोध को देखकर विरोधी का और समवाय को
देख कर समवायी का ज्ञान होता है, उस को लैङ्गिक=आनुमानिक ज्ञान
कहते हैं ॥ १ ॥
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