वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
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अष्टमाऽध्याय २ आन्हिक १३३
(द्रव्येषु) कार्य द्रव्यों में (पञ्चात्मकत्वम्) पञ्चात्त्वात्मक होना [कहा
गया है] ॥
यद्यपि १३२ और १३४ में पञ्चात्मक और द्व्यात्मक का निषेध कर चुके
हैं परन्तु १३५ में कह चुके हैं कि "अणुसंयोग का निषेध नहीं है" इस लिये
यहां पञ्चात्मकता कहना पूर्व्वापर विरुद्ध नहीं है ॥ ४ ॥ जैसे-
३२७-भूयस्त्वाद् गन्धवत्त्वाच्च पृथिवी गन्धज्ञाने प्रकृतिः ॥५॥
(भूयस्त्वात्) बहुत होने से (च) और (गन्धवत्त्वात्) गन्धवर्मी होने
से (पृथिवी) पृथिवीतत्त्व (गन्धज्ञाने) गन्ध के ज्ञान कराने वाले नासिका
इन्द्रिय में (प्रकृतिः) उपादान कारण है ॥ ५ ॥ तथा-
३२८-तथापस्तेजोवायुश्च रसरूपस्पर्शज्ञानेऽविशेषात् ॥६॥
(तथा) इसी प्रकार (अविशेषात्) समान होने से (रस, रूप, स्पर्श,
ज्ञाने) रस, रूप, और स्पर्श के ज्ञान कराने वाले रसना, चक्षु और त्वचा
इन्द्रियों में [क्रम से] (आपः) जलतत्त्व, (तेजः) अग्नितत्त्व (च) और
(वायुः) वायुतत्त्व [उपादान कारण हैं] ॥
जिस प्रकार नासिका इन्द्रिय में पृथिवी उपादान कारण है, इसी प्रकार
रसना इन्द्रिय में जल, चक्षु इन्द्रिय में अग्नि और त्वचा इन्द्रिय में वायु
उपादान कारण हैं ॥ ६ ॥
इस द्वितीय आन्हिक में ज्ञान, ज्ञान का प्रकार; इन्द्रियों के कारण और
"अर्थ" शब्द का अर्थ वर्णन किया गया ॥
इति अष्टमाध्यायस्य द्वितीयमान्हिकम्
॥ २ ॥
इति श्री तुलसीराम स्वामिकृते,
वैशेषिकदर्शनभाषानुवादे ज्ञानाऽध्यायोऽष्टमः
॥ ८ ॥
CC-0.Panini Kanya Maha Vidyalaya Collection.