वैशेषिक दर्शन (कणाद सूत्र व हिन्दी भाष्य सहित)
Vaisheshika Darshana with Hindi Bhashya
by महर्षि कणाद
Source: स्वामीमेशिन यन्त्रालय · स्वामीमेशिन यन्त्रालय (origin)
Page 136 of 160
Read in context१३२ वैशेषिकदर्शन-भाषानुवाद
भिन्न २ एक दूसरे के पश्चात् होते हैं, इस लिये ज्ञान भी एक दूसरे के पश्चात्
होते हैं, न कि एक कारण और दूसरा उस का कार्य होने से ॥ १९ ॥
इस आह्निक में द्रव्य गुण कर्म और सामान्य में जो प्रत्यक्ष ज्ञान होता
है, वह परीक्षापूर्वक वर्णन किया गया ॥
इत्यष्टमाध्यायस्य प्रथमाह्निकम्
॥ १ ॥
अथ द्वितीयाह्निकम्
अब ज्ञान के प्रकार का उदाहरण देते हैं-
३२३-अयमेश त्वया कृतं भोजयैनमिति बुद्ध्यपेक्षम् ॥ १ ॥
(अयम्) यह है, (एषः) वह है, (त्वया कृतम्) तूने कर्म किया,
(एनं भोजय) इन को भोजन कराओ (इति) इस प्रकार का ज्ञान (बुद्ध्यपेक्षम्)
भिन्न २ बुद्धियों से होता है ॥ १ ॥
प्रश्न-यह है, तूने कर्म किया, इस को भोजन कराओ, इत्यादि समक्ष-
वर्त्ती पदार्थों में तो प्रत्यक्ष ज्ञान हो सकता है परन्तु "वह वहां है" इत्यादि
परोक्षवर्त्ती पदार्थों में प्रत्यक्ष ज्ञान कैसे हो सकता है ? उत्तर-
३२४-दृष्टेषु भावाददृष्टेष्वभावात् ॥ २ ॥
(दृष्टेषु) जाने हुए विषयों में [भावात्) होने से (अदृष्टेषु) बिना
जाने विषयों में (अभावात्) न होने से ॥
अर्थात् हम जिन परोक्ष विषयों का निर्देश करते हैं कि वह वहां है,
इत्यादि । सो पहिले देखे, जाने, विषयों में निर्देश करते हैं, इस लिये परोक्ष
विषयों में भी "वह वहां है" इत्यादि निर्देश प्रत्यक्षज्ञानपूर्वक ही समझना
चाहिये, क्योंकि अदृष्ट अर्थात् जिन के साथ हमारी ज्ञानेन्द्रियों का सम्बन्ध
नहीं हुवा, उन को हम यह, वह, इत्यादि प्रकार से व्यवहार नहीं करते ॥ २ ॥
प्रश्न-तुम "अर्थ" शब्द से किस का ग्रहण करते हो ? उत्तर-
३२५-अर्थ इति द्रव्यगुणकर्मसु ॥ ३ ॥
(द्रव्यगुणकर्मसु) द्रव्यों, गुणों और कर्मों में (अर्थः) "अर्थ" (इति)
ऐसा व्यवहार करते हैं ॥ ३ ॥
३२६-द्रव्येषु पञ्चात्मकत्वम् ॥ ४ ॥