तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')
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कोई व्यक्ति धर्म, अर्थ एवं काम का अपने जीवन में तिरुक्कुरळ् में कहे अनुसार
व्यवहार करेगा तो चौथा पुरुषार्थ उसे आप से आप प्राप्त हो जाएगा । तत्पश्चात्
वह स्वयं उसका अनुभव भी कर लेगा, और साथ-साथ यह भी कि वह अव्यक्त
अवस्था अवर्णनीय है ।¹ दूसरा कारण यह है कि जिसे यह पुरुषार्थ प्राप्त हो
जाय, वह इसका अपने मुख से वर्णन नहीं करेगा; और जो इसका वर्णन करे,
उसे वास्तव में इसका अनुभव नहीं हुआ समझना चाहिए ।² कबीर ने कहा
ही है—
“जो देखे सो कहे नहीं, कहे सो देखे नाहिं ।
सुने सो समझावे नहीं, नैन - जीभ - कन काहिं ॥”
अतः तिरुवळ्ळुवर ने मोक्ष पर किसी अध्याय की रचना नहीं की है।
पर हाँ, प्रस्तावना के चार अध्यायों, में इस चतुर्थ पुरुषार्थ के सम्बन्ध में अप्रत्यक्ष
रूप से सूचना मात्र दे दी है³ और तद्हेतु जीवन के विभिन्न क्षेत्रों को लेकर
एक सामान्य मानव-धर्म-पथ का उल्लेख कर दिया है ।
- “अविगत गति कछु कहत न आवै ।
ज्यों गूंगेहि मीठे फल को रस अन्तरगत ही भावै ॥
परम स्वाद सब ही जु निरन्तर अमित तोष उपजावै ।
मन बानी को अगम अगोचर सो जानै जो पावै ।”
—सूरदास - “He who has seen will not say,
He who says, has not seen.” - “வீடொன்று பாயிர நான்கு” (சிறு மேதாவியார்)
अर्थात् ‘मोक्ष इक प्रस्तावना चार ।’ तात्पर्य यह कि प्रथम चार
अध्यायों को एक पृथक खण्ड ‘मोक्ष’ पर मानने से तिरुक्कुरळ् मे चार
खण्ड—क्रमशः मोक्ष, धर्म, अर्थ एवं काम पर चारों पुरुषार्थों के हो जाते
हैं । इस प्रकार तिरुक्कुरळ् ‘चतुर्पुरुषार्थ-निरूपण ग्रन्थ’ है ।
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