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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')

DevanagariHindipublished334 pages

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16 भूमिका
तिरुवळ्ळुवर कहते हैं कि कोई व्यक्ति कितना ही महान् क्यों न हो,
मानव को चाहिए कि उसके विचारों को ध्यान से सुनकर उन पर स्वयं चिन्तन एवं
मनन करे, और सत्य मात्र को स्वीकार करे । तात्पर्य यह है कि कथित विषय का
विवेचन स्वयं भी अपनी बुद्धि से करके वास्तविकता की छान-बीन करे, और
युक्तियुक्त हो तो उस पर विश्वास लावे, अन्यथा नहीं । यही ज्ञान कहलाता है ।
अन्धानुकरण अज्ञान का चिह्न है । कबीर ने भी कहा है—
“ लेना होय सो लेय ले,
कही-सुनी मत मान । ”
एक दूसरे स्थान में तिरुवळ्ळुवर ने यहाँ तक कह दिया है—
किसी वस्तु का गुण कुछ भी हो,
उसमें सत्य निरखना ज्ञान । ¹
सारांश यह है कि तिरुवळ्ळुवर ने व्यक्तिगत विचारों को मानव के सम्मुख
उपस्थित करके, अपनी बुद्धि के आधार पर उन पर मनसा-वाचा-कर्मणा आचरण
करने की सम्मति दी है । सम्पूर्ण ग्रन्थ में कहीं भी धार्मिक अथवा अन्य
किसी प्रकार के प्रमाण की छाप² नहीं लगायी है । यह वर्तमान काल के
प्रजातन्त्र-वाद के दृष्टिकोण से भी युक्तियुक्त सिद्ध होता है ।
तिरुक्कुरळ् एक नीति-ग्रन्थ है जिसमें पुरुषार्थों का विशद विवेचन एवं
स्पष्टीकरण हुआ है । धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों में से कवि ने
केवल प्रथम तीन का ही प्रत्यक्ष रूप से वर्णन किया है । चौथे पुरुषार्थ—
मोक्ष—का शब्दों में विशद वर्णन दो कारणों से नहीं किया है । प्रथम यह कि यदि

  1. “ எப்பொரு ளெத்தன்மைத தாயினு மப்பொருண்
    மெய்ப்பொருள் காண்ப தறிவு ”. (2-36-5.)
    2 “ Stamp of Religion or any other type of Sanction. ”