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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')

DevanagariHindipublished334 pages

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भूमिका 15
इस समालोचना-सूक्ति को शिथिल मानकर सरस्वती का साक्षात् अवतार
मानी जानेवाली तमिऴ कवयित्री अव्वयार ने कुरळ् की अपार शक्ति का अवलोकन
करके कहा—
' अणु को ही छिद, सत सागर भर,
काटै मध्य कुरळ् ।'¹
हिन्दी साहित्य के प्रेमी कविवर बिहारीलाल के दोहों में उपस्थित
“ गागर में सागर ” के गुण से परिचित ही हैं। बिहारी के दोहों के सम्बन्ध में
कहा गया है—
“ सतसैया के दोहरे, अरु नावक के तीर ।
देखत के छोटे लगैं, घाव करैं गम्भीर ॥ ”
यही गुण हम तिरुवळ्ळुवर में अत्यधिक मात्रा में पाते हैं ।
विचार स्वातन्त्र्य की भावना इस नीति-ग्रन्थ की अपनी एक अनुपम
विशिष्टता है । ध्यान देने का विषय है कि यह कोई परम्परागत अथवा एक-
पक्षीय धर्म-ग्रन्थ तो है ही नहीं । सम्पूर्ण ग्रन्थ में रचयिता ने अपने विभिन्न
विचारों को स्पष्टतः व्यक्त करके अन्तिम निर्णय का अधिकार पाठक को ही दे
दिया है । कवि ने स्वयं ही कहा है—
जो भी सुनें किसी भी जन से,
उसमें सत्य निरखना ज्ञान ।²

  1. “ அணுவைத் துளைத்தேழ் கடலைப் புகட்டிக்
    குறுகத் தரித்த குறள். ” (ஔவையார்)
    2, “ எப்பொருள் யார்யார்வாய்க் கேட்பினு மப்பொருள்
    மெய்ப்பொருள் காண்ப தறிவு. ”
    (2-43-3)