तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')
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Read in context14 भूमिका
इसके रचयिता 'दैविक कवि', 'भगवान', व 'पिता'¹ आदि नामों से स्मरण
किये जाते हैं। इसमें जो तत्त्व व्यक्त किये गये हैं वे सभी मनुष्यों, देशों व
कालों के लिए सत्य ठहरते हैं। अतः इसे "सत्य वचन"² की संज्ञा से भी
सम्मानित किया जाता है।
यद्यपि तमिऴ भाषा में आचरण एवं नीति के ग्रन्थ अनेकानेक हैं, तथापि
उनमें तिरुक्कुरळ् का स्थान कुछ विलक्षण ही है। निकटतः दो सहस्राब्दियों के
पूर्व रचित ऐसा अपूर्व काव्य-ग्रन्थ कदाचित् अन्य किसी भाषा-साहित्य में
अप्राप्य है। इन सबका यही कारण है कि यह ऐसा विशिष्ट नीति-ग्रन्थ है जो
भाव, भाषा एवं साहित्यिक सौंदर्य से पूर्ण है, और जिसके साधु-लेखक ने मनुष्य
के सामान्य आचरण एवं व्यवहार भूमि पर अवस्थित होकर अपनी सर्वतोमुखी
प्रतिभा एवं सुविशाल विचार-धारा से प्रेरित सर्वग्राह्य मानव-धर्म के तत्वों को सुन्दर
समास शैली में स्पष्टतः व्यक्त किया है। अनेकानेक गम्भीर भाव-चित्रों को अपने
मानस-पटल पर अंकित करके उन्हें उसी रूप में न्यूनातिन्यून शब्दों में चित्रित
करने में तिरुवळ्ळुवर विश्व साहित्य में अद्वितीय हैं³। कोई भी सहृदय पाठक
तिरुक्कुरळ् को आद्योपान्त पढ़कर उनके तत्त्वों को हृदयंगम करने के पश्चात् उक्त
कथन की सत्यता को माप सकता है। कवि इडैक्काडर ने ठीक ही कहा है :—
'सरसों को छिद, सत सागर भर,
काटे मध्य कुरळ्।'⁴
- 'தெய்வப் புலவா', 'நாயனா'
- 'பொய்யா மொழி.' "செய்யா மொழிக்கும் திருவள்ளுவர் மொழிந்த
பொய்யா மொழிக்கும் பொருள் ஒன்றே." (வெள்ளி வீதியார்) - "It is truly an apple of gold in a net-work of silver."
(P. vi—Introduction to 'The Sacred Kural' by G. U. Pope) - "கடுகைத துளைத்தேழ் கடலைப் புகட்டிக
குறுகத தரித்த குறள்." (இடைக்காடா)