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तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)

Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi

by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')

DevanagariHindipublished334 pages

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भूमिका 13
गम्भीरता के अनुपात में होता है। इसकी एक विशेषता यह है कि इसके भाव
गम्भीर व नितनूतन होते हुए भी अत्यन्त सरल एवं स्पष्ट हैं।
तिरुक्कुरळ् एक मुक्तक काव्य है। इसका प्रत्येक पद पृथक् - पृथक्
मोती के सदृश विशिष्ट व्यक्तित्व से युक्त है। प्रत्येक पद स्वतन्त्र रूप से पूर्ण
अर्थ का द्योतक है। ऐसा होते हुए भी इसकी रचना में आद्योपान्त एक सम्बन्ध
सूत्र व धारावाहिकता भी है, जो यह सिद्ध करती है कि यह एक संग्रह ग्रन्थ
नहीं, अपितु एक पूर्ण क्रमबद्ध रचना है। इसका प्रत्येक अध्याय पूर्वोक्त अध्याय
से, एवं प्रत्येक पद पूर्वोक्त पद से विकसित ज्ञात होता है। दूसरे शब्दों में इस
प्रकार हम कह सकते हैं कि यह मोक्ष प्राप्ति के लिए एक प्रशस्त सोपान है
जिसके तीन खण्ड हैं—धर्म, अर्थ एवं काम। इसका एक-एक पद उस प्रशस्त
सोपान का एक - एक पद है। जिस प्रकार सोपान का प्रत्येक पद अपने में पूर्ण
होता हुआ भी निम्न पद के पश्चात् एवं आगामी पद के पूर्व होता है और इस
प्रकार एक क्रम-बद्धता रहती है, उसी प्रकार तिरुक्कुरळ् के पदों में भी एक
'क्रम-बद्धता, एक नियम व भावों का क्रमिक विकास हम देख सकते हैं।
तिरुक्कुरळ् एक 'सामान्य नीति-ग्रन्थ'¹ है। यह किसी मत - विशेष,
काल-विशेष अथवा स्थान-विशेष का ग्रन्थ नहीं है। यह ग्रन्थ हिन्दू, जैन, बौद्ध,
ईसाई, इस्लाम आदि सभी, से समाहृत हुआ है। जिस प्रकार यह ईसा की
प्रारम्भिक शताब्दियों में समाहृत हुआ था, उसी प्रकार आज भी हो रहा है,
और सदा होता रहेगा। सभी मनुष्य समान रूप से इसका अध्ययन व सम्मान
करते हैं। भारत में ही नहीं प्रत्युत पाश्चात्य एवं प्राच्य देशों में भी इसका नाम
सादर लिया जाता है। इसी हेतु यह रचना 'सम-धर्म-ग्रन्थ'² की संज्ञा से, और

  1. பொது நீதி நூல்—Common Ethical Code
  2. 'समयப் பொது நூல்'