तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')
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Read in contextभूमिका 7
के लिए प्रस्तुत हूँ। वासुकी ने आत्म-विश्वास के बल पर वैसा ही करके मानो
यह सिद्ध कर दिया कि तिरुक्कुरळ् में जो कहा गया है—
'ईश न, नित उठ पूजै पति को,
बरसो कह दे तो बरसे।'¹ (१-६-५)
सत्य है।
विवाह के उपरान्त एक दिन कोई एकव्यक्ति जिसे यह सन्देह था कि एक
साधारण जुलाहा इतना श्रेष्ठ कैसे हो सकता है, इनके पास आया और उसने प्रश्न
किया—“गार्हस्थ्य-जीवन श्रेष्ठ है या सन्यास?” इसका शब्दों में उसे कोई उत्तर
प्राप्त नहीं हुआ। तिरुवळ्ळुवर के गार्हस्थ्य-जीवन के निरीक्षण से ही उत्तर प्राप्त
करने के लिए उसे छोड़ दिया। कुछ समय पश्चात् जब वासुकी कुएँ से पानी
खींच रही थी, इन्होंने उसे बुलाया। वासुकी जल से पूर्ण पात्र को कुएँ में ही
आधी खिंची छोड़कर तुरन्त अपने पति के सम्मुख आ उपस्थित हुई। वह पात्र
उसी अवस्था में वासुकी के लौटने पर मिला! और एक बार जब प्रातःकाल के
समय ठण्डा भात² खाते-खाते इन्होंने कहा कि भात बहुत गरम होने के कारण मुँह
तक जलने लगा, वासुकी बिना किसी हिचकिचाहट के तुरन्त पंखा झलने लगी।
दिन प्रकाशपूर्ण मध्याह्न के समय कपड़ा बुनने का काम करते हुए अपनी ढरकी को
गिराकर उसे खोजने के लिए इन्होंने दीपक मांगा तो वासुकी ने बिना कुछ
पूछे-ताछे दीपक ला दिया। इस प्रकार की अनेक अन्य घटनाओं को देखकर प्रश्न
का उत्तर आपसे आप प्रश्नकर्ता को प्राप्त हो गया कि ऐसी पत्नी हो तो गार्हस्थ्य
श्रेष्ठ है, अन्यथा सन्यास³।
- தெய்வந் தொழாஅள் கொழுநற் றொழுதெழுவாள்
பெய்யெனப் பெய்யு மழை.”-(குறள 1-6-5). - देखिये—पृ० ४४१—'विश्ववाणी', दिसम्बर १९४६.
- சற்றேனும்--ஏறுமாறாக விருப்பாளே யாமாயின்
கூறாமற் சன்னியாசங் கொள்.” ( தனிப்பா. 1-95-14)
तनिक भी—हो विषम पत्नी तो बिन कह ग्रहण कर सन्यास।