तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')
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प्रत्यय, एवं 'कुरळ्' एक छन्द का नाम होने के कारण इस ग्रंथ का नाम
तिरुक्कुरळ् पड़ा । ग्रन्थ का क्या नाम रक्खा कवि ने, यह अज्ञात है। यह
एक नीति ग्रन्थ है जिसमें कुल १३३० कुरळ् हैं । आश्चर्य की बात यह है कि
एक का भी पाठ-भेद प्रचलित नहीं है और ग्रन्थ जिस रूप में आज उपस्थित
है वही उसका मूल रूप था, यद्यपि ग्रन्थकर्ता एवं ग्रन्थ के मूल नाम अप्राप्य
हैं । ग्रन्थ के तीन खण्ड हैं — धर्म, अर्थ, एवं काम (अरम्, पोरुळ्, इन्बम्) ;
और इनमें क्रमशः ३८, ७० एवं २५ अध्याय हैं तथा प्रत्येक अध्याय में
१० कुरळ् हैं । 'धर्म' में प्रस्तावना के रूप में सर्वेश-स्तुति से प्रारम्भ करके
'मोक्ष' (वीडु) की भी अप्रत्यक्ष रूप से सूचना देते हुए गार्हस्थ्य-धर्म एवं
सन्यास-धर्म के स्पष्टीकरण के पश्चात् एक अध्याय में कर्म सिद्धान्त को भी व्यक्त
कर दिया गया है। 'अर्थ' में सम्राट् व शासन, अमात्य व राजनीति के विभिन्न
अंग तथा शासक व शासित के शेष कार्यों का विशद् वर्णन किया गया है।
'काम' में प्रेमी-प्रेमिका के पूर्वराग व गुप्त प्रेम तथा सतीत्व का, अर्थात् सम्भोग
तथा वियोग शृंगार का पुंखानुपुंख रूप से चित्रण किया गया है । इस प्रकार
कवि ने अपनी कृति में मानव के व्यक्तिगत, गार्हस्थ्य एवं सामूहिक जीवन के
आदर्श को प्रस्तुत करने का सफल प्रयत्न किया है । इससे स्वतः सिद्ध हो जाता
है कि तिरुवळ्ळुवर एक आदर्शवादी दार्शनिक, राजनीति-विदग्ध तथा उत्तम कोटि
के रसिक भी थे ।
तिरुवळ्ळुवर ने अपने जीवन में इस कृति में कथित सब आदर्शों को
कार्य रूप में परिणत कर दिखाया है। इनके गार्हस्थ्य-जीवन के सम्बन्ध में
अनेक कथाएँ प्रसिद्ध हैं । वासुकी इनकी पत्नी का नाम था । विवाह के पूर्व
वासुकी के पिता ने तिरुवळ्ळुवर के आदर्श-जीवन से प्रभावित होकर अपनी पुत्री
को तिरुवळ्ळुवर से अर्धांगिनी के रूप में ग्रहण कर लेने की अभ्यर्थना की।
तिरुवळ्ळुवर ने एक बालू के पुलिन्दे की ओर सूचित करते हुए अपनी स्वीकृति
इस शर्त पर दी कि यदि वह इसे पकाकर उसे भात बना दे तो मैं पाणिग्रहण