तिरुक्कुरळ् (सन्त तिरुवल्लुवर - तमिल वेद / उत्तरवेद: धर्म, अर्थ एवं काम सविस्तार हिन्दी भाषान्तर)
Tirukkural of Saint Tiruvalluvar in Hindi
by सन्त तिरुवल्लुवर (अनुवादक: खेमानन्द 'रहत')
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तिरुक्कुरळ् के प्रारम्भिक छन्द के आधार पर इनके माता - पिता का नाम
'आदि-भगवन्' माना जाता है। छन्द यह है :-
“ अकर मुदल वॆष़ुत्तेल्ला मादि
भगवन् मुदट्त्रे युलहु । ”
वस्तुतः निश्चित् रूप से कुछ कहा नही जा सकता । इतना अवश्य ज्ञात है कि
वे कबीर के ही समान जुलाहे का कार्य करते थे और उन्होंने मद्रास नगर के
पर्यन्तभाग मयिलापुर (मयिल=मोर, पुर=नगर) की एक कुटि में सपत्नीक सानन्द
जीवन व्यतीत किया । यह स्थान समुद्र तट के अति निकट होने के कारण इनका
अनेक विदेशियों से मिलना-जुलना रहता था । साथ-साथ दक्षिण भारत का यह एक
प्रधान स्थान होने के कारण सभी प्रकार के लोगों का यहाँ आना - जाना सदैव
रहा जिससे इनका सम्पर्क तात्कालिक सभी विचार-धाराओं के विभिन्न व्यक्तियों
से बना रहा । हिन्दू, जैन, बौद्ध आदि मत के विभिन्न सिद्धान्त इनको ज्ञात थे
और उनके दैनिक-जीवन से ये पूर्ण परिचित थे । इसी कारण से इनकी
विचार-धारा अत्यन्त व्यापक हो सकी ।
इस प्रकार जीवन व्यतीत करते हुए तिरुवळ्ळुवर ने अपने एक मात्र ग्रन्थ
'तिरुक्कुरळ्' की रचना की, कदाचित् पड़ोसियों की प्रार्थना पर, जैसाकि कुछ
लोग मानते हैं । 'कुरळ्'¹ का मूल अर्थ है 'छोटा' । यह एक छोटे छन्द का
भी नाम है जिसमें दो चरण होते हैं । प्रथम में चार Cīr ' पद ' व ' गण '
होते हैं तथा द्वितीय में केवल तीन । इसकी रचना का नियम अत्यन्त क्लिष्ट है ।
एक कुरळ् में एक भाव-विशेष पूर्णतः निहित रहता है । 'तिरु' एक आदर-सूचक
- குறள் ' Kural '—1. Shortness, dwarfishness; 2. Dwarf,
about 2 ft. high; 3. Imp, goblin; 4. Smallness, 5. A
line consisting of two ' Cīr '; 6. Distich of a 'Venba'
metre, the first line consisting of four and the second of
three feet; 7. Tirukkural--(Tamil Lexicon PP. 1046-47)